Sunday, 28 June 2020

पेड़ और बच्चा*

एक पेड़ था। उसके पास एक बच्चा खेलने आता था। बच्चा उसकी डालियों से खेलता, फूल तोड़ता। पूरा दिन वह उस पेड़ के पास खेलता। कभी-कभी उसी की छांव में सो भी जाता। पेड़ बहुत आनन्दित होता। पेड़ को बच्चे से प्रेम हो गया था। जब कभी वह बच्चा उसके पास नहीं आता तब वह चिंतित हो जाता।

समय बीतता गया। बच्चा बड़ा हो गया। वह स्कूल जाने लगा। वहाँ उसे कई सारे यार दोस्त मिले। अब वह बच्चा पेड़ के पास कम ही आता। लेकिन जब भी आता तब वह पेड़ एक प्रमोद से भर जाता, आह्लादित हो जाता।

बच्चा अब जवान हो गया था। उसका पेड़ के पास आना एकदम कम हो गया। पेड़ प्रेम के वशीभूत निरंतर उसकी राह देखता था। वह चिंतित रहने लगा। एक दिन वह युवक उस पेड़ के पास से गुजर रहा था। पेड़ जोर से चिल्लाया- "आओ! मेरे पास आओ। मेरे पास बैठो, मेरी डालियों से खेलो।" उस युवक ने उत्तर दिया- "मैं बाजार जा रहा हूँ। मुझे रूपये चाहिये। क्या है तुम्हारे पास जो तुम मुझे दे सकते हो?" पेड़ ने कहा- "मेरे पास रूपये तो नहीं है, जो मैं तुम्हें दे सकूं। रूपये तो आदमी की ईज़ाद हैं।" उस युवक ने कहा- "फिर तुम्हारे पास आना व्यर्थ है।" पेड़ ने मन में विचार किया -" अहंकार हमेशा लेना जानता है। जबकि प्रेम देना जानता है। इस बच्चे को क्या हो गया है? कभी मेरे पास ही इसे स्वर्ग का सुख अनुभव होता था। आज यह पूछता है क्या है मेरे पास?" फिर पेड़ ने मुस्कुराते हुए कहा - "यद्यपि मेरे पास रूपये नहीं हैं लेकिन तुम मेरे फल तोड़ कर ले जा सकते हो। इसे बाजार में बेंचकर रूपये पा सकते हो।" युवक ने फल तोड़ लिया। जाते समय उसने मुड़कर पेड़ को देखा भी नहीं। धन्यवाद भी नहीं दिया।

युवक पैसे से और पैसे बनाने लगा। फिर वह खूब धनी हो गया। अब भी वह पेड़ के पास नहीं जाता था। लेकिन पेड़ निरंतर उसकी राह देखता रहता था। एक दिन जब वह उस पेड़ के पास से गुजर रहा था। पेड़ ने उसे देखा। उसने सोचा - "अब तो यह बच्चा मुझे पहचानता भी नहीं। अब बच्चा काफी बड़ा हो गया है? खैर मैं ही बुलाता हूँ।" पेड़ ने उसे पुकारा - "वो भाई, भूल गये मुझे। मैं वही पेड़ हूँ ।जिसके पास तुम बचपन में खेला करते थे। मेरे पास आओ। मेरे पास बैठो। मुझे छुओ। मुझसे खेलो।" युवक ने जवाब दिया - "मैं क्यों आऊं तुम्हारे पास? क्या तुम मुझे एक घर दे सकते हो?" पेड़ ने कहा - "नहीं, मेरे पास घर तो नहीं है। लेकिन तुम मेरी डाली और टहनियां ले जा सकते हो। इससे तुम घर भी बना सकते हो और दरवाजे खिड़की आदि भी।" युवक पेड़ काटने लगा। पेड़ जब काटा जा रहा था। उसे पीड़ा हो रही थी। उसकी आंखो से पानी बह रहा था। फिर भी वह खुश था, क्योंकि वह अपने प्रिय के काम आ रहा था। उसे पीड़ा में भी एक सुख था। युवक ने पेड़ की सभी डालियों और टहनियों को काट डाला। और बिना कुछ कहे चला गया। पेड़ अब एक ठूंठ बचा था। हवाएं उसे छू कर निकल जाती थीं। अब वह पहले की तरह लहरा नहीं सकता था। पक्षी भी उसके पास अब नहीं आते थे। फिर भी वह उस बच्चे की राह देखता था। एक दिन वह जरूर आयेगा………।

काफी समय बीत गया। वह दुबारा नहीं आया। एक दिन कुछ लोग एक शव ले जा रहे थे। पेड़ ने देखा, वह डर गया कि वह बच्चा जो आज के सत्तर - अस्सी साल पहले उसके पास खेला करता था, कहीं………। उसने हिम्मत करके एक व्यक्ति से पूछा - "भाई, यह कौन है? जो बिना हिले डुले जा रहा है, जिसको चार लोग कंधे पर उठाये हुए हैं?" किसी ने जवाब दिया - "यह वही लड़का है जो तुम्हारे पास खेलने आता था। अब खेलने नहीं आ पायेगा।" पेड़ ने सोचा - "खेलने को तो काफी समय से नहीं आ रहा था। लेकिन……" उसने कहा - "भाई, मेरा इनका बचपन से नाता है। अब न तो यह मुझसे कुछ मांग सकते हैं और न ही मैं इन्हें कुछ दे सकता हूँ। पर मेरे इस बचे ठूंठ को काटकर, इन्हीं के साथ जला दो।"

अनुवादक - विन्ध्येश्वरी

*अमेरिकी लेखक शेलडाॅन एलन सिलवरस्टीन की कहानी "द गिविंग ट्री" का हिंदी भावानुवाद

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