वस्तुतः मनुष्य के भीतर उसके दुर्गुण (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, अहंकार आदि) सदा से एक जैसे रहे हैं। ये बुराइयां आज भी मनुष्य में यथावत हैं। लेकिन हर व्यक्ति या तो भविष्य में जीता है या भूतकाल में। भविष्य की सुखद तस्वीर और भूतकाल की मीठी यादें उसे गुदगुदाती हैं। साथ ही अगर कोई बुजुर्ग आपकी पीढ़ी को निम्नतर सिद्ध करना चाहेगा तो वह अपने समय की मिसालें देंगा। जबकि भूतकाल में वह भी वही सब कर चुका है जो खताएं आज आप कर रहे हैं। यही हाल युग - प्रशस्ति के बारे में भी समीचीन (सही) है।
मैं तो मानता हूँ कि कई मामलों में पहले की अपेक्षा अब अधिक उदारवादी रुख है। समाज के अंतरण के कारण आज कई सारी बुराइयां दूर हुईं हैं। लोगों को पहले से अधिक अधिकार प्राप्त हुए हैं। सारांशतः अपने समय को कोसना बंद कर, समाज को और सुंदर बनाने का यत्न करना चाहिए।
©विन्ध्येश्वरी

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