Friday, 19 June 2020

अंधकार बनाम प्रकाश

एक लड़का अंधेरे कमरे में बैठा था। उसके पिता आये तो उन्होंने पूछा - "बेटे, अंधेरे कमरे में क्यों बैठे हो? एक दिया तो जला लेते? उस लड़के ने कहा - "वह इंतजार कर रहा है कि जब अंधकार खत्म हो जायेगा, तब वह दिया जलायेगा।" पिता ने कहा - "क्या मूर्खता पूर्ण बात कर रहे हो? भला बिना दिया जलाये अंधकार कैसे मिटेगा?"

लड़का गलत था या सही, यह निर्णय आप कीजिये। लेकिन हम आज भी हजारों वर्षों से अंधेरा छंटने के बाद दिया जलाने का इंतज़ार कर रहे हैं। आप कहेंगे क्या पागलों वाली बातें कर रहे हो? मैं सच कह रहा हूँ। क्योंकि धर्मशास्त्रों में लिखा है और संत लोग भी यही कहते हैं कि अपने काम, क्रोध, लोभ का दमन करोगे तभी परमात्मा मिलेगा। ईश्वर को प्राप्त करने के लिये त्याग जरूरी है (भले ही वे हमारे चढ़ावे और दक्षिणा का इंतज़ार कर रहे हों और कम मिलने पर नाक-भौं सिकोड़ते हों)।

हमारी वासनाएं हमारे भीतर मौजूद अंधकार हैं। इस अंधकार का नाश करने के लिए प्रकाश की आवश्यकता है। प्रकाश क्या है? यह ठीक अंधकार का विपरीत है। यानि प्रकाश की अनुपस्थिति ही अंधकार है। अंधकार को आप ढूंढते रहिये लेकिन यह कहीं नहीं मिलेगा। हमारी वासनाएं भी कहीं नहीं है। यह वासनाओं के विपरीत (निर्लिप्ति) की अनुपस्थिति मात्र हैं।

प्रश्न है कि इस वासना रूपी अंधकार को समाप्त कैसे किया जाये। इसका एक सहज और सरल मार्ग है। जैसे हम अंधकार को दूर करने के लिए अंधकार के जाने का इंतज़ार नहीं कर सकते वैसे ही बुराई को दूर करने के लिए बुराई के जाने का इंतज़ार निरर्थक है। अच्छाई को स्वीकार कर उसे आचरण में शामिल करें। बुराई अपने आप खत्म होने लेगेगी।

जन्म के समय लोग बिना किसी खास हुनर के पैदा होते हैं। लेकिन हम यह कभी नहीं कहते कि जब हमें चलना आ जायेगा तभी हम चलेंगे। जब हम हमें बोलना आ जायेगा तभी बोलेंगे। हम यत्न करते हैं और फिर वैसा होने लगता है। हमारी अज्ञानता नष्ट होती जाती है और हम धीरे-धीरे सब सीखते चले जाते हैं।

ध्यान रहे हमें अंधकार, अज्ञान या वासना से लड़ना नहीं है। क्योंकि हम इनसे लड़कर इन्हें कभी नहीं हरा सकते चाहे कोई कितना ही बलवान, धनवान, सामर्थ्यवान क्यों न हो। वरन इनसे लड़ कर हम इन्हें और शक्तिशाली बनाते हैं। कल्पना कीजिए कि आप एक विश्वविजेता पहलवान है और आप एक अंधेरे कमरे में हैं। आप हाथ में लठ्ठ लेकर अंधेरे को ढूंढ रहे हैं - "मिल तुझे अभी सबक सिखाता हूँ।" क्या होगा? आप अंधेरे का तो कुछ नहीं बिगाड़ पायेंगे ऊपर से दीवारों से सिर टकराकर अपना माथा ही लहूलुहान करेगें। ठीक ऐसे ही अज्ञान को समाप्त करने के न तो धन की जरूरत है और न ही बल की, बल्कि इसके लिये ज्ञान का एक छोटा सा दिया ही काफी है।

आपको क्या लगता है अगर उपरोक्त बातें कुछ हद तक सही हैं तो क्या वासना पर यह सिद्धांत लागू नहीं होता? होता है। जब आप अपने क्रोध को रोकते हैं तब आप क्रोध से लड़ रहे होते हैं। क्रोध का कुछ नहीं बिगड़ता लेकिन आप अपना नुकसान जरूर कर बैठते हैं। जब आप काम को रोकते हैं तब आप उसे कई गुना शक्तिशाली बना रहे होते हैं। इसका कुल जमा मतलब यह है कि हमें इनसे लड़ना नहीं बल्कि समझना है - "आखिर यह क्यों है?" फिर उसका हमें निदान करना है।

भूगोल में हवाओं का एक नियम है, हवाएं हमेशा उच्च वायुदाब से निम्न वायुदाब की ओर चलती हैं। लेकिन दिलचस्प तथ्य यह है कि पृथ्वी पर कभी भी कोई ऐसी जगह नहीं है जहां हवा मौजूद नहीं है। फिर ऐसा कैसे होता है कि हवा चले? सीधा सा उत्तर है अगर कहीं हवा के कम दबाव की थोड़ी सी भी गुंजाइश है तो तत्काल उस क्षेत्र में उससे जरा सी भी ज्यादा हवा के क्षेत्र से हवाएं दौड़ने लगती हैं। यानि हवा का दबाव लगभग संतुलित बना रहता है।

हमारे जीवन में भी अंधकार और प्रकाश, अच्छाई और बुराई, ज्ञान और अज्ञान इसी दबाव के नियम का अनुसरण करते हैं। अगर प्रकाश कमजोर हुआ तो अंधकार हावी, अगर अंधकार कमजोर हुआ तो प्रकाश हावी। अच्छाई कमजोर हुई तो बुराई हावी और बुराई कमजोर हुई तो अच्छाई हावी। ज्ञान कमजोर हुआ अज्ञान हावी और अज्ञान कमजोर हुआ तो ज्ञान हावी।

इसका मंतव्य यह है कि हमें अपने जीवन में अंधकार, बुराई और अज्ञान के छंटने का इंतज़ार नहीं करना है। अंधकार को नजरअंदाज कर प्रकाश का, बुराई को नजरअंदाज कर अच्छाई का, अज्ञान को नजरअंदाज कर ज्ञान एक दिया जलाना है। हम अंधकार, अज्ञान और बुराई को अपने से दूर कर सकेंगे।

©विन्ध्येश्वरी

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