उसने अपनी छोटी बेटी (हिरोइन) को इस लफड़े में न पड़ने की सलाह घोंट घोंट कर पिलाया। बेटी के मन में करियर को पाने का जनून भर दिया। बेटी भी लगभग माँ के अनुसार ही चल रही थी कि एक मोड़ पर हीरो टकरा जाता है। फिर वह प्यार में पड़ जाती है। फिर वह "गलती" कर बैठती है। अंततः करियर में सेटेल होने के बाद भी उसका हृदय उस प्रेमी से ही लगा रहता है। यद्यपि वह कहती है कि "उसने काम को ही ब्वाॅयफ्रेंड बना लिया है लेकिन यह कहने के सिवाय और कुछ नहीं है। 12 - 15 घंटे की नौकरी, तमाम पचड़े-लफड़े, भाग-दौड़। वह अपने शानदार चमकते करियर से ऊब चुकी है। यद्यपि आर्थिक स्वतंत्रता है लेकिन उसे यहाँ रोबोट बन कर जीना पड़ रहा है। उसे भी अपने निर्णय पर मलाल है।
जीवन में कोई भी चीज हमारे माकूल नहीं हो सकती फिर निर्णय भी उससे भिन्न कैसे हो सकता है?हमारा निर्णय सही है या गलत यह वक्त तय करता है। एल्बा का युद्ध हारने के बाद नेपोलियन से पूछा गया - "क्या आप अपने को एक सफल सम्राट मानते हैं?" उसने कहा - "हाँ, लेकिन एल्बा का युद्ध हारने से पहले।"हमारे हर निर्णय पर कुछ दिन बाद एक काश!!!………… लगता है। जीवन का कोई भी निर्णय सौ प्रतिशत सही कैसे हो सकता है? हर निर्णय के पीछे कुछ सही और कुछ गलत होता है। हमारे निर्णय की सफलता या असफलता दो बातों से तय होती है-
1- जो हमने सोचा था वह मिला या नहीं। और अगर मिला तो कितने प्रतिशत तक मिला।
2- उसे पाने या निर्णय को सही सिद्ध करने के लिए क्या कीमत चुकानी पड़ी क्योंकि हर निर्णय की एक कीमत होती है।
यदि थोड़ा सा और आगे बढ़कर कहा जाये तो यह निर्णय के मसले से ज्यादा "मनोविज्ञान" का मसला है। जो हमें मिल जाता है वह हमारे लिये मूल्यहीन हो जाता है और जो नहीं मिलता है या जो गोपन में होता है उसका आकर्षण निरंतर बना रहता है। आमतौर प्रेमी - प्रेमिका का जीवन एक्साइटमेंट भरा होता है। छुप छुपा कर मिलते हुए एक छोटा सा चुंबन या एक स्पर्श स्वर्ग की खुशी देता है। यदि कोई कई प्रेमियों या प्रेमिकाओं के साथ ऐसा नहीं कर चुका है तो या जब तक की गुप्त धन बाहर नहीं आ जाता तब तक। जबकि पति - पत्नी का जीवन शुरुआती दिनों को छोड़कर धीरे-धीरे इससे हीन होने लगता है। क्यों? क्योंकि वहाँ सबकुछ खुली किताब हो जाता है। जिस नौकरी को हम पाने के लिये मरे जा रहे होते हैं, कुछ समय के बाद वह भी निरस और बोरियत भरा लगने लगता है। क्यों? क्योंकि उसका तिलस्म हमारे सामने उजागर हो चुका होता है। हम जिस स्थान पर रहते हैं वहां हजारों लोग घूमने आते हैं हम शायद ही कभी जाते हों। हम दूसरे प्रदेश या देश में घूमने जाते हैं। हमें अपना स्थान उतना घूमने योग्य नहीं लगता और दूसरों को अपना। क्यों? वही अज्ञात का आनन्द। इसीलिए किसी शायर ने कहा है - "दुनिया जिसे कहती है जादू का खिलौना। मिल जाये तो मिट्टी है खो जाये है सोना।" अज्ञात और गोपन का आनन्द कुछ दूसरा है। मनुष्य उसे महसूस करके ही खुश होता है। जब उसे वह मिल जाता है तब वह मिट्टी के समान हो जाता है।
©विन्ध्येश्वरी
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