Saturday, 20 June 2020

प्रेम का घर

"कबिरा यह घर प्रेम का, खाला का घर नाहिं।
शीश उतारे भुईं धरे, सो घर पैठे माहिं॥"


कबीरदास जी कहते हैं कि ईश्वर का घर मौसी का घर नहीं है, जब मर्जी, जैसी मर्जी हाथ झुलाते चले आये। यह प्रेम का घर है। यहाँ प्रवेश पाने के लिये अपना शीश चढ़ाना पड़ता है। अर्थात ईश्वर को पाने के लिए अपने अहंकार का बलिदान करना पड़ेगा। आप अहम के साथ ईश्वर के परिसर में प्रवेश नहीं पा सकते।

हमारे भीतर पद, प्रतिष्ठा, शक्ति, धन, ज्ञान आदि का अभिमान भरा रहता है। इस अभिमान के साथ हम ईश्वर के मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, चर्च में चाहे जितना माथा रगड़ लें, चाहे जितनी पूजा-आरती, अजान-नमाज-प्रेयर, रोजा-व्रत-फास्ट रख लें, ईश्वर का साक्षात्कार असंभव है। हम सब ईश्वर को मूर्ख समझते हैं। ये वो चढ़ाने - करने से ईश्वर मिल जायेगा। इतना सस्ता ईश्वर नहीं है। उसे हमारा शीश चाहिए, हमारा अभिमान चाहिए। अभिमान मुक्त होकर हम न केवल ईश्वरत्व का सहज साक्षात्कार कर सकते हैं, वरन स्वयं ईश्वर हो सकते हैं।

जब तक हमारे भीतर अहम भाव (यानि मैं हूँ) है तब तक ईश्वरत्व की प्राप्ति असंभव है। इसीलिये कबीर कहते भी हैं "जब 'मैं' था तब हरि नहीं, अब हरि हैं 'मैं' नाहिं। प्रेम गली अति सांकरी, तामे दो न समाहिं॥" जब तक मेरे भीतर 'मैं भाव' था तब तक ईश्वर नहीं था और जब ईश्वर आया तब 'मैं' नहीं हूँ। यह प्रेम की गली बहुत ही संकरी है। इसमें दो चीजें एक साथ नहीं समा सकतीं। या तो अहंकार रहेगा या फिर ईश्वर। अतः मुक्त मन से "त्वदीयं वस्तु गोविंदं, तुभ्यमेव समर्पये।" मेरा पद - मेरी बेगारी, मेरी प्रतिष्ठा - मेरी तौहीन, मेरा धन - मेरी गुरबत, मेरी शक्ति - मेरी निशक्तता, मेरा ज्ञान - मेरा अज्ञान, मेरा मान - मेरा अपमान सब तेरा है। मेरा मुझ में कुछ नहीं है जो है सो तोर।

©विन्ध्येश्वरी

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