Sunday, 7 June 2020

स्त्री के दो रूप


कुछ लोग कहते हैं कि "मैं स्त्रीवादी हूँ।" मेरा प्रश्न है कि "स्त्रीवादी होना क्या होता है?" फिलहाल मैं स्पष्ट कर दूँ कि मेरा किसी वाद में कोई विश्वास नहीं है। किंतु सत्य को जानना और कहना, अन्याय और गलत का विरोध, शठ के साथ शठता आदि कुछ मेरी बुनियादी कमियां हैं। इसकी जद में जो भी आता है या आयेगा उसका पोल खोल होगा।

रही बात स्त्रीवादी होने की ऐसा  होने में कोई बुराई नजर नहीं आती। स्त्री इस संसार की वह प्राणी है जिसे हमेशा निम्नतम दर्जे का माना गया है। यहाँ तक कि निम्न जातियों में भी स्त्री उससे भी निम्न है। शायद सबसे गयी गुजरी। क्योंकि जब पशु को खरीदा जाता है तो खरीदने वाला उसका दाम देता है लेकिन अपनी बेटी (जोो कि एक स्त्री ही है) का हाथ सौंपने वाला पिता लेने वाले को धन देता है। इससे बड़ी घृणास्पद बात क्या हो सकती है?

मामला यहीं समाप्त नहीं होता। जिस घर में वह जाती है वहाँ उसे पशु से भी बदतर जीवन जीना पड़ता है। घर का सारा काम (भोजन पकाना, चौका बरतन करना, झाड़ू पोछा करना, कपड़े धुलना आदि) उसी के जिम्मे, सबकी सेवा सुश्रूषा करना, सबके खाने के बाद बचा खुचा खाना, सबके सोने के बाद सोना और सबके जागने के पहले जागना। इसके बावजूद यह कहा जाता है तुम करती ही क्या हो? तुम्हारी औकात ही क्या है? दुख, बीमार होने पर कोई बात पूछने वाला नहीं होता। कई लोग तो इसे स्त्री द्वारा काम से बचने हेतु नाटक भी मानते हैं। ताना- फबती, डांट-मार, हिंसा सब उसकी दिनचर्या के अंग हैं।

बच्चा न हो तो स्त्री दोषी। लड़की हो जाये तो वही दोषी। बच्चे बिगड़ जाये तो उसे ही लानत मलानत सहनी पड़ती है। बचपन में पिता का संरक्षण, युवापन में पति और ससुराल वालों का धौंस, वृद्धावस्था में बच्चों का उत्पीड़न। कहां जाये ये स्त्री? इसीलिए महादेवी वर्मा जी ने कहा है - "अबला जीवन हाय तुम्हारी। आंचल में है दूध और आंखों में पानी।"

शिक्षा का अधिकार, आर्थिक अधिकार, अपनी इच्छा से निर्बाध विचरण का अधिकार आदि मौलिक अधिकारों से भी स्त्रियों को सदियों से वंचित रखा गया है। सभी धर्मों के शास्त्रों, ग्रंथों में सदा सर्वदा स्त्री को दबा कर रखने का ही उपदेश दिया गया है। जो समाज के हर व्यक्ति के मन में गहरे तक धंसा हुआ है।

अगर इन ज्यादतियों के विरोध में मैं कुछ लिख देता हूँ, बोल देता हूँ तो इसमें मेरी कोई महानता नहीं है, न ही यह किसी के विरोध में है और न इसे स्त्रीवादी होना ही कहा जा सकता है। बल्कि यह स्त्री के लिए शताब्दियों से हो रहे अन्याय का प्रतिकार करने हेतु एक विनम्र लेकिन तुच्छ प्रयास है। इन समस्त विद्रूपताओं के बीच स्त्री का एक खास गुण भी है जो संभवतः स्त्री भी नहीं जानती।

प्राकृतिक रूप से स्त्री शांत, सहृदय, कोमल और दयालु स्वभाव की होती है। लोग उसके इसी गुण का नाजायज़ फ़ायदा उठाते हैं। उन्हें लगता है कि विनम्र व्यक्ति आसानी से दबाया जा सकता है। ठीक उसी तरह जैसे सीधे बांस को आसानी से काटा जा सकता है। लेकिन ऐसा करने वाले यह भूल जाते हैं कि सीधे बांस से लाठी भी बनती है जो बड़े से बड़े पहलवान की खोपड़ी खोलने की ताकत रखती है। स्त्री के साथ भी ऐसा है। सृजन की देवी ने जब जब अपना रौद्र रूप लिया है या विनाश पर उतरी है तो फिर कुछ बाकी नहीं बचा। फिर चाहे वह देवासुर संग्राम में काली और दुर्गा का अवतार हो या फिर राम - रावण युद्ध में सीता की गुप्त भूमिका हो या फिर महाभारत के युद्ध में द्रौपदी का हाथ।

अभी आज की नारी अपने दूसरे रूप में पूरी तरह से नहीं आयी है। लेकिन वह समय बिल्कुल भी दूर नहीं है जब वह यह रूप भी ग्रहण कर लेगी। उस समय सृजन की देवी विनाश करेगी। जो नये युग के निर्माण का कारण बनेगा।

©विन्ध्येश्वरी

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