चक्रवात तब बनता है जब उसके केंद्र में न्यूनवायुदाब (हवा का कम दबाव) होता है। न्यूनवायुदाब के कारण चक्रवात आगे बढ़ता है। जब यह न्यूनवायुदाब अधिक बढ़ जाता है तब यह चक्रवात प्रायः विनाशकारी होता है। इसमें तीव्र हवाएं, बिजली की कड़क, गरज, तीव्र बारिश आदि घटनाएं होती हैं। इससे हजारों की संख्या में जान व खरबों के माल का नुकसान होता है।
इस तूफान से बचने का हाल फिलहाल कोई विशेष साधन मौजूद नहीं है। सिवाय चक्रवात की जद में आने वाले लोगों को वहाँ से सुरक्षित जगह पर रखने के।
एक उपाय और है। वह है समुद्र तटीय क्षेत्रों में मैंग्रोव वन को लगाना। मैंग्रोव वन चक्रवात की तीव्रता को कम कर सकते हैं। इससे विनाश कम होता है। लेकिन रोकने का कोई उपाय मौजूद नहीं है।
अब आते हैं असली मुद्दे पर। मानव के मन में विषाद, तनाव अदि एक तरीके का न्यूनवायुदाब रूपी चक्रवात है। झुंझलाहट, चिड़चिड़ापन, क्रोध आदि मानसिक चक्रवात के घटक हैं। हाल फिलहाल इस मानसिक चक्रवात से बचने का कोई विशेष उपाय उपलब्ध नहीं है। सिवाय इसके कि इससे पीड़ित व्यक्ति को कुछ विभ्रमकारी दवाएं दी जाये जिससे वह अपना विषाद कुछ देर के लिये भूल जाये। या कुछ लोग इससे बचने के लिए शराब का भी सहारा लेते हैं। या उस व्यक्ति के आसपास के लोगों को उसके पास से हटा दिया जाये जिससे उसके किसी तांडवकारी कृत्य का असर उन पर न पड़े।
इस मानसिक चक्रवात से बचने में एक सदमित्र मैग्रोव वन की भूमिका निभा सकता है। वह चक्रवात के असर को कम कर सकता है। संभव है छोटे-मोटे या कमजोर चक्रवात को समाप्त भी कर दे (स्मरणीय है कि मैंग्रोव वन असर कम कर सकते हैं चक्रवात को नहीं)। लेकिन समस्या यह है कि जिस प्रकार मैंग्रोव वन कम बचे हैं, क्योंकि उनकी कटाई (कृषि और अन्य औद्योगिक कार्यों के लिये) अधिक हो रही है। मनुष्य का लालच मैंग्रोव वनों को निगल रहा है। ठीक उसी प्रकार अब सच्चे मित्र भी कम ही बचे हैं। इन पर भी मनुष्य का लालच, भौतिकतावाद, स्वार्थ आदि हावी हो गया है।
अंततः हमें दो स्तरों पर कार्य करना पड़ेगा-
1- रोकने का उपाय:- प्राकृतिक चक्रवात को रोकने के लिये मैंग्रोव वन का क्षेत्रफल बढ़ाया जाये। इन्हें वृहद पैमाने पर लगाया जाये। ठीक उसी प्रकार से अच्छे मित्रों की संख्या बढ़ाने के लिए समाज में नैतिकता, सद आचरण को बढ़ावा देना चाहिए। बच्चों के सामने अच्छे मित्रों का उदाहरण रखना चाहिए।
2- खत्म करने का उपाय:- कोई ऐसी तकनीक विकसित की जाये जिससे चक्रवात की परिस्थिति ही उत्पन्न न हो (फिलहाल ऐसा संभव नहीं है)। लेकिन मानसिक चक्रवात को उसके उद्गम स्थल या उससे भी पहले रोकने के कुछ उपाय अवश्य हैं। जैसे -
१- निष्काम कर्मयोग (कर्म को अपने जीवन-मरण का प्रश्न न बना कर केवल ईश्वर की मर्जी मानकर करना)
२- संतोष (साईं इतना दीजिए जामे……… क्योंकि ताउम्र भटकने के बाद सारा ऐश्वर्य, सारी प्रसिद्धि, सारी शक्ति यहीं धरी रह जायेगी ऐसा भान होना।)
३- स्वयं को जानना (मनुष्य मूलतः कई प्रकार की वृत्तियों जैसे - काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद आदि का समुच्चय है। जब भी मन में इनमें से कोई वृत्ति उठे तब उस वृत्ति के उठने के कारण की तलाश करना। 99.99% अवसरों पर हम इन्हें निरर्थक ही पायेंगे। यहीं से मन शांत होना शुरू होगा। ध्यान रहे इन वृत्तियों का दमन नहीं करना है। दमन करने से ये और भी उग्र हो जाती हैं। जैसा कि समाज में कहावत भी है "किसी को इतना मत दबाओ (डराओ) कि वह दबना (डरना) ही छोड़ दे।)
४- योग, ध्यान, प्राणायाम
©विन्ध्येश्वरी

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