आपने महात्मा बुद्ध और अंगुलिमाल के बारे में तो सुना ही होगा। अंगुलिमाल एक खूंखार डाकू था। जो लोगों की हत्या कर उनका सामान लूट लेता था। राजा प्रसेनजित के राज्य में अंगुलिमाल का आतंक चारों ओर व्याप्त था। एकदिन महात्मा बुद्ध राजा प्रसेनजित के महल में ठहरे थे। जाते समय वे उसी रास्ते से जाने लगे जिधर अंगुलिमाल रहता था। राजा ने कहा - "उधर खूंखार डाकू अंगुलिमाल रहता है। आप उधर से न जायें।" बुद्ध ने कहा - "मैं तो उसी रास्ते पर चलता हूँ, जो मैंने तय कर लिया है।" और वे चल पड़े।
रास्ते में अंगुलिमाल एक ऊंचा मचान बनाकर रहता था ताकि दूर से आने वाले राहगीरों को देख सके। उसने दूर से बुद्ध को आते देखा तो चिल्लाया - "तुम वहीं से लौट जाओ। मैं लोगों की हत्या करता हूँ। तुम मुझे संयासी दिख रहे हो इसलिये मैं तुम्हें छोड़ दे रहा हूँ। लौट जाओ। नहीं तो मैं तुम्हें मार दूंगा।" बुद्ध ने कहा - "मैं तो इसी रास्ते पर जाऊंगा। और हत्या तो मैं भी तुम्हारी कर दूंगा।" अंगुलिमाल उनके सामने आ गया। उसने कहा - "मूर्ख संयासी मरने के लिये तैयार हो जाओ।" बुद्ध ने कहा - "तुम मुझे मार देना। लेकिन पहले एक काम कर दो। इस पेड़ से चार पत्ते तोड़ दो।" अंगुलिमाल ने अपनी तलवार से पेड़ की पूरी डाली ही काट दी। उसने कहा - "लो यह पूरी डाली मैंने काट दिया। अब पत्ते ले लो। फिर मरने के लिए तैयार हो जाओ।" बुद्ध कहा - "ठीक है। लेकिन एक काम और कर दो, इस डाली को पुनः वहीं जोड़ दो।" अंगुलिमाल ने कहा - "यह कैसे संभव है? यह टूटी हुई डाली फिर नहीं जोड़ी जा सकती।" बुद्ध ने कहा - "मैंने तुम्हारी शक्ति के बारे में बहुत सुना था। लेकिन तुम तो बहुत कमजोर निकले। काटने का काम एक निशक्त आदमी भी कर सकता था। तुम उससे भी गये गुजरे हो। कहां है तुम्हारी शक्ति, तुम्हारा पौरुष?" अंगुलिमाल चकित हो गया। उसे एहसास हो गया कि वह वास्तव में कमजोर है। असली शक्ति तो तब है जब काटने के साथ जोड़ने का भी काम किया जा सके। शक्ति तो तब है जब घृणा करने वाले पर भी करुणा बरसे। फिर वह बुद्ध का अनुगत हो गया।
दरअसल यह शारीरिक बल और क्रूरता की शक्ति का सदमार्ग की तरफ उन्मुख होना था। हमारी वासनाएं हमारे भीतर मौजूद कमजोरी भी हैं और शक्ति भी। आप इसे ऐसे समझिए जैसे घर के सामने घूर (गांवों में घर का कूड़ा, कचरा, सब्जी के छिलके, गोबर आदि को एक जगह फेंका जाता है, उसे देहाती में घूर कहते हैं)। घूर प्राथमिक तौर पर कूड़े और अपशिष्टों का ढेर है, जिससे बदबू आती है। निहायत ही गंदा। जब आप इसे रोज जाकर खोदते रहते तब यह बदबू, यह कचरा चारों ओर फैल जाता है। वातावरण को प्रदूषित कर देता है। लेकिन जब एक दिन हम इसे अपने खेत में ले जाकर फेंक देते हैं और फिर अच्छे से फैलाकर, खेत की जुताई-गुड़ाई, सिंचाई, बुआई कर देते हैं तब यही गंदा, बेकार घूर उसकी उर्वराशक्ति को कई गुना बढ़ा देता है। उसी खेत से जबर्दस्त पैदावार हासिल होती है या बाग में डाल देने पर वही बदबू खुशबू में बदल जाती है।
इसी प्रकार हमारी वासनाएं भी हैं। कूड़ा, कचरा, गंदा, बेकार। अगर हमें अधिक क्रोध आता है, अगर हम अधिक कामी हैं, अगर हम बेतहाशा लालची और हद दर्जे के घमंडी हैं। और यह हमें बार बार हो रहा है तब यह ठीक वैसे है जैसे हम घूर को रोज - रोज खोद कर छोड़ देते हैं। लेकिन यदि हम इसका सही इस्तेमाल जान ले तो फिर यह शक्ति में बदल जाती हैं जो हमारे जीवन को बदलने का सामर्थ्य रखती हैं। यही शक्ति संसार को सुवासित कर सकती है।
कल्पना कीजिए कि आप एक निहायत ही कमजोर आदमी है। लेकिन आपके सामने एक शेर आ जाता है। आप पूरी शक्ति से जान बचाने के लिए भागते हैं। इतनी तेज भागते हैं कि सामान्य दशा में यह असंभव था। इतनी शक्ति आपमें कहाँ से आ गयी?
मान लीजिए आप एक शांत - सौम्य व्यक्ति हैं। अचानक आपके सामने कोई ऐसा कृत्य हो जाता है, जब आप आगबबूला हो जाते हैं। चेहरा एक दम लाल - पीला हो गया है, दांत कटकटा रहे हैं, आंखें लाल लाल, नसें फूली हुई और शरीर तमतमा रहा है। यह क्या है? यह हमारे आपके भीतर मौजूद एक शक्ति है।
हम सामान्य दशा में काम के प्रति स्थिर चित्त होते हैं। लेकिन किसी सुंदर स्त्री या पुरुष को देखकर अंग-अंग रोमांच से भर जाता है। रोम-रोम में काम का संचार हो जाता है। जब मनुष्य कामोत्सुक हो जाता है फिर उसे कुछ नहीं सूझता। आखिर कहाँ से आयी यह शक्ति?
दरअसल यह वासनाएं हमारे भीतर मौजूद युरेनियम की गांठ जैसी हैं जिनमें अपार ऊर्जा भरी हुई है। जो एक रिएक्शन के द्वारा ऊर्जा में बदल जाती हैं। यदि यह किसी आतंकवादी विचारधारा वाले आदमी/देश (जैसे आई. एस. आई. एस./अमेरिका) के हाथ पड़ जाये तो सर्वनाश कर सकता है या उसी के बल पर दुनिया के ऊपर दादागीरी हांक सकता है। अथवा यदि यह किसी शांति प्रिय देश (जैसे भारत) के हाथ पड़ जाता है तब वह इसका उपयोग जनकल्याण के लिये ऊर्जा के उत्पादन में करेगा।
प्रथम द्रष्टया चाहे हमारे भीतर मौजूद वासना हो या प्रकृति में मौजूद परमाणु खतरनाक ही नजर आते हैं। अब तीन बातें हो सकती हैं। एक - इनके खतरे को भांप कर हम इनका दमन कर दें या इन्हें यूं ही पड़ा रहने देें। इस स्थिति में ऊर्जा से कोई खतरा तो नहीं है लेकिन यह अपार ऊर्जा बेकार हो गयी है। दूसरा - इन्हें घातक बम या पाप का माध्यम बना दें और विनाश करेें। तीसरा - हम इन्हें उचित प्रक्रिया के द्वारा ऊर्जा में बदल दें, अच्छे हाथों में जाने देंं, जिससे विकास हो सके। ध्यान रहे हमें इन शक्तियों का दमन नहीं करना है। जब हम अपने भीतर मौजूद शक्तियों का दमन करते हैं तब यह हमारे शरीर को ही नुकसान पहुंचाता है। हमारे शरीर को विषाक्त कर देता है। हमारे शरीर में विकारों को जन्म देता है। अत्यधिक चिंतित रहने वाले आदमी के चेहरे पर झुर्रियां जल्दी पड़ती हैं, वह जल्दी बीमार पड़ता है। अत्यधिक क्रोधी आदमी की भौंहै हमेशा तनी रहती है। आंखें निकली रहती हैं। काम केे वेग को रोकनेे से नपुंसकता आती है। या अत्यधिक कामी व्यक्ति जल्दी वृद्ध होता है। हमें इन शक्तियों को सही मार्ग देना है, दबाना नहीं है।
हमारे समाज में सैकड़ों ऐसे उदाहरण हैं जिन्होंने ऊर्जा का सदुपयोग और दुरुपयोग दोनों किया है। हिटलर के पास बुद्धि, वाकपटुता, नेतृत्वकौशल था उसने इस शक्ति का उपयोग लाखों लोगों का संहार करने और विश्व को महायुद्ध में झोंकने में किया। यही शक्ति गांधी के पास भी थी। उन्होंने इससे विश्व को एक नयी दिशा देने का काम किया। अकबर के पास काम की शक्ति अधिक थी, उसने अपने हरम को सुंदर स्त्रियों से सजा रखा था। यही ऊर्जा तुलसीदास के पास भी थी। उन्होंने पत्नी से दुत्कार खाने के बाद इसे राम की तरफ मोड़ दिया। ऐसे ही नेपोलियन, सिकंदर, मुसोलिनी, ओसामा, तैमूर, चंगेज आदि ने भी अपनी शक्ति को गलत दिशा देकर समाज को पीड़ित, प्रताड़ित किया। यही ऊर्जा बुद्ध, महावीर, आचार्य शंकर, कबीर, मीरा, सूर, अरस्तू, प्लेटो, मुहम्मद और जीसस आदि के पास भी थी। इन्होंने इसे सही दिशा देकर संसार को सुंदर बनाने का प्रयत्न किया।
प्रश्न उठता है कि इन शक्तियों का प्रयोग किस प्रकार किया जाये कि यह हमारे लिए सकारात्मक परिणाम देने वाली हों? कुछ तरीके इस प्रकार हैं-
ऊर्जा को बाहर निकलना-
1- हफ्ते में एक आध दिन आप एक बंद कमरे में वह करिये जो आप सभ्य समाज में नहीं कर सकते। जैसे- अपने कमीने बाॅस या पति/पत्नी या पड़ोसी या टीचर का कार्टून या स्केच बनाकर उसे गंदी - गंदी गालियां दीजिये, जूतों से कूटिये, थूकिये, मारियेे, चिढाइये।
2- या अगर आप समाज और बड़े - बुजुर्गों के के सामने लज्जा के नाते खुलकर हंस नहीं सकते तो एक बंद कमरे में जमकर हंसिये। ठठा मारकर हंसिये। अथवा पद और घंमड के कारण खुलकर रो नहीं सकते तो आइने में खुद को देखते हुए दहाड़े मारकर रोइये।
3- आप अधिक लोभी हैं तो भगवान के सामने बैठकर उनकी मानसिक पूजा करिये। उनको मंहगे से मंहगा भोजन, वस्त्र, मिठाई, फल-फूल, चढ़ाइये। एकदिन आप पायेंगे कि यह लोभ खत्म हो रहा है।
कुछ दिन के अभ्यासके बाद आप पायेगे कि अंदर से एकदम शांत हो रहें हैं। ये वासनाएं धीरे-धीरे शांत हो रही हैं। इसी समय हमें दूसरा कार्य करना होगा। रचनात्मक कार्य….
ऊर्जा की दिशा को मोड़ना या रचनात्मक कार्य-
1- लोभ को त्याग से, काम को राम से, क्रोध को प्रेम से, ईर्ष्या को सम्मान से, घंमड को शून्यता से जीता जा सकता है।
2- बच्चों को बचपन से ही ऊर्जा को सही दिशा देना सिखाना चाहिए। जैसे- जब बच्चा किसी चीज को तोड़ रहा हो तब उसे यह मत कहिये - "यह मत करो। बल्कि उससे कहिये यह करो।" फूल तोड़ने पर मना करने के बजाय उसे फूल बनाना या पौधा लगाना सिखाइये। किताब फाड़ने पर चिल्लाकर पिटाई करने के बजाय कुछ बनाना सिखाइये। इससे उसकी ऊर्जा बचपन ही रचनात्मक हो जायेगी।
©विन्ध्येश्वरी
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