Sunday, 14 June 2020

आत्महत्या किसी समस्या का हल नहीं है - सुशांत सिंह राजपूत

"आत्महत्या किसी समस्या का हल नहीं है" फिर ऐसा क्यों?
वस्तुतः मनुष्य के भीतर "कुछ होने" की प्रबल इच्छा उसे दिन-रात दौड़ाती रहती है। दिग-दिगांतर में प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा, लोगों के मध्य शक्ति और प्रभुत्व, इफरात बैंक बैलेंस, ऊंची-ऊंची अट्टालिकाएं एवं प्रासाद, ऐश्वर्य - सुख और आराम आदि ये अनन्त इच्छाएं पहले तो पूरा करने का दबाव और फिर सहेजने का झंझट। मनुष्य को अंदर से भोथरा कर देता है। वह राग-द्वेष, आशा-निराशा, मोह-आधिपत्य के भंवर में डूब जाता है। "दुनिया जिसे कहती है जादू का खिलौना। मिल जाये तो मिट्टी है खो जाये तो है सोना।"

जीवन का ध्येय सांसारिक वैभव नहीं है, भीतर की मस्ती है, आंतरिक आनन्द है। लेकिन मनुष्य की विडम्बना यही कि वह इसे बाहर खोजता है। एक इच्छा, महत्त्वाकांक्षा की प्रतिपूर्ति के बाद अगली, अगली के बाद अगली, फिर अगली……… फिर किसी मोड़ पर जीवन की निस्सारता समझ आती है। अधिकांश लोगों को बुढ़ापे में और कुछ को पहले। जब यह जीवन, यह संसार, यह भाग दौड़ निस्सार लगने लगता है तब जन्म लेता यह तो संयास या फिर आत्महत्या………… ।

जीवन में पाने का ध्येय और खोने का गम सिर्फ़ इतना होना चाहिए जितने में जीवन जिया जा सके। किंतु यदि अधिक पाना ही हो तो निष्काम होकर, मैं प्रभु का और सब प्रभु का। न पाने की खुशी और न खोने का गम। "साईं इतना दीजिये, जामे कुटुम सामाय। आप न भूखा रहूँ, साधु न भूखा जाये॥" लेकिन जीवन में पाने का अंतहीन सिलसिला है यह या तो वृद्धावस्था की मृत्यु से समाप्त होता या फिर आकस्मिक मृत्यु से। परंतु इस मृत्यु से पहले भी मनुष्य करोड़ों बार मरता है, प्रतिपल मरता है, कदम-दर-कदम मरता है क्योंकि वह भीतर से जगा हुआ नहीं है, भीतर से खुश नहीं है। ये सामान, ये इंतजाम, ये वैभव हमें खुश नहीं कर सकता। अगर करेगा भी दो चार पल या दिन के लिये। फिर वही निस्सार जीवन और अगली भागमभाग।

कहीं तो रुकना चाहिए इसे। अंतहीन अभीप्सा, लालसा तथा इससे उपजे विषाद और तनाव को रोकना होगा। इसका एक और सुंदर मार्ग है कुछ न करना। कभी शांत होकर बिना कुछ विचार किये बैठना, कभी खुद से बात करन। याया अगर करना ही है तो निष्काम होकर करना। बस। परम शांति! परम शांति! परम शांति!

©विन्ध्येश्वरी

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