Tuesday, 16 June 2020

दीपक और प्रकाश

प्रकाश की आवश्यकता सभी को है लेकिन दीपक कोई नहीं बनना चाहता है। जब तक मनुष्य अपना दीपक खुद नहीं बनेगा तब तक उसे दूसरों से प्रकाश उधार लेना पड़ेगा। कुछ लोग मेरी इस बात से नइत्तेफाक रख सकते हैं जो कि रखना ही चाहिये, क्योंकि उनका दावा हो सकता है "आखिर दीपक के पास तेल और बाती तो दूसरे की होगी। फिर कोई अपना दीपक खुद कैसे हो सकता है?" प्रारंभिक तौर पर वे लोग सही हैं लेकिन वास्तव में गलत। क्योंकि दीपक के पास तेल और बाती भले ही दूसरों की ही लेकिन प्रकाश उसका अपना होता है। न तो केवल तेल से प्रकाश उत्पन्न हो सकता है और न ही केवल बाती से। इन दोनों चीजों को मिलाकर प्रकाश उत्पन्न करने का कार्य दीपक ही करता है। ध्यान रहे इस प्रक्रिया में न तो तेल, न बाती और न ही दीपक महत्त्वपूर्ण है। महत्त्वपूर्ण है तो उससे प्रस्फुटित प्रकाश।

इस जगत का दुर्भाग्य यह है कि जब कोई प्रकाश स्रोत बनना चाहता है तो प्रकाश विरोधी हवाएँ उसे समूल नष्ट करने को प्रयत्नशील हो जाती है। अपने अंतिम क्षण तक नष्ट करना चाहती लेकिन जब वे नष्ट नहीं कर पाती (क्योंकि प्रकाश एक ऊर्जा है। ऊर्जा को न तो नष्ट किया जा सकता है और न ही उत्पन्न। यह तो बस होता है। जिसकी दृष्टि में मोतियाबिन्द नहीं हुआ होता उसे दिखता है। बाकी अंधों का क्या?)। तब वे प्रकाश को ही आंधी का रूप दे देती हैं जो महाविनाशकारी होता है।

सारी दुनिया, जिसे अनश्वर प्रकाश से जगमग - जगमग होना चाहिए था, वह उन दुष्ट और भयावह आंधियों के हाथ पड़ कर संसार को जलाने लगता है। सदियों से इस संसार में यही होता आ रहा है। कृष्ण जिसने क्लीव (कायर) हो चुके अर्जुन को प्रकाशित कर पुरुषार्थ के लिये उद्यत किया। उसी कृष्ण के प्रकाश से जिस जगत को आलोकित होना था आंधियों (पंडे, पुजारियों) ने बड़वाग्नि का रूप दे दिया। उनके नाम पर कथाएं कही जाती हैं। भागवत माहात्म्य में वर्णन आता है कि उनकी कथा को सुनकर प्रेतयोनि धुंधरकारी मुक्त हो गया। हजारों वर्षों से वही कथा सुन-सुनाकर भी कोई पंडित या उसका चेला मुक्त नहीं हुआ। क्यों? क्योंकि जिस कृष्ण के प्रकाश को हमें अपने भीतर भरना था उसे न भरकर आंधियों के संग जाने दिया।

यही हाल राम, कबीर, बुद्ध, महावीर, क्राइस्ट आदि के साथ हुआ। आज ये प्रकाशपुंज रूप आत्माएं मूर्ख, पाखंडी, स्वार्थी तत्वों के हाथ में पड़कर एक नये उपद्रव को जन्म दे रही है। कबीर, जिन्होंने हमेशा मूर्ति पूजा का विरोध किया, आज उनकी मूर्तियां बनाकर पूजी जा रही है। राम, जिन्होंने मर्यादा की प्रतिष्ठा की, उनके कथित अनुयायी सैकड़ों बार मर्यादाओं की चादर तार तार कर चुके हैं। बुद्ध, जिन्होंने ईश्वर की सत्ता को मानने से इंकार कर दिया था, आज खुद भगवान बना दिये गये हैं। महावीर, जिन्होंने कहा कि शायद मैं भी सच हूँ, शायद आप भी सच हैं और शायद वे भी सच हैं, उनके अनुयायी सिर्फ खुद को ही सच मान रहे हैं। क्राइस्ट, जिन्होंने खुद सूली चढ़कर ईश्वर से दूसरों के गुनाहों को माफ करने की प्रार्थना किया, उन्हीं के अनुयायियों ने कल, बल, छल से पूरे विश्व को आक्रांत कर डाला।

प्रकाश और उसकी ऊर्जा का इससे बड़ा दुरुपयोग संभवतः ब्रह्मांड में अन्यत्र नहीं है। अंततः मेरा मानना है कि हमें अपना दीपक खुद बनकर संसार को आलोकित भी करना है और आंधियों के हाथ न पड़ कर संसार को जलने से बचाना भी है।

©विन्ध्येश्वरी

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