जीवन क्या है? और मृत्यु क्या है? दरअस्ल दोनों ही भ्रम है। जीवन की अनुपस्थिति ही मृत्यु है। जैसे प्रकाश की अनुपस्थिति अंधकार है। स्वास्थ्य की अनुपस्थिति अस्वास्थ्य है। मैं दोनों को भ्रम क्यों कह रहा हूँ। क्योंकि जिसे हम जीवन कहते हैं वह जीवन नहीं है और जिसे मृत्यु कहते हैं वह मृत्यु नहीं है। जिसे हम जीवन कहते हैं वह मृत्यु की तैयारी है और जिसे हम मृत्यु कहते हैं वह नये जीवन की तैयारी है। असली जीवन हमारे द्वारा गढ़े गये जीवन और मृत्यु के बीच मौजूद है। हम शरीर के बनने को जीवन को कहते हैं और शरीर के नष्ट होने को मृत्यु। यह सरासर भ्रामक धारणा है।
वस्तुतः मृत्यु जैसा कुछ होता ही नहीं है, होता है सिर्फ़ जीवन। शरीरी रूप में भी वह जीवन मौजूद है और मृत्यु की भी अवस्था में। उसे हम आत्मा, रूह, soul, sprit आदि नामों से जानते हैं। यह अनन्त ब्रह्मांड जो ऊर्जा ही है से निर्मित ऊर्जा का लघु कण है। विज्ञान भी सिद्ध करता है ऊर्जा को न तो नष्ट किया जा सकता है और न ही उत्पन्न। लेकिन जब हम अपने सुंदर शरीर और संसार की कृत्रिमता में फंस जाते हैं तब हम सत्य को भूल जाते हैं और शरीर तथा संसार को वास्तविक मानने लगता है। जब हम शरीर और संसार को ही वास्तविक मानते हैं तब शुरु होता है, अपने होने का भान, स्वयं को प्रतिष्ठित करने की होड़, अपना-पराया, छल-छद्म, ईर्ष्या-द्वेष, पाप-पुण्य, युद्ध-शांति, समाज-राष्ट्र, परिवार-कुल आदि की अवधारणाएं। फिर शुरू होता है सब प्रपंच और फिर इसका अंतहीन सिलसिला………………
फिर इससे निकलने के अनेकानेक उपाय और उपायों का जाल। फिर मनुष्य इसी में फंसा रह जाता है। पुनरपि जननं पुनरपि मरणं।
इससे बचने का मुझे जो एकमात्र उपाय सूझता है (जो मेरा अनुभव भी है) वह है मरने की कला का ज्ञान। चौंकिए नहीं। सच कह रहा हूँ। मैं आचार्य रविशंकर की तरह से आर्ट आफ लाइफ नहीं जानता। मैं जानता हूँ "आर्ट आफ डाइंग"। क्योंकि मेरा मानना है कि जो मरना जान गया वह जीना खुद ब खुद जान जायेगा। असल में मरना कुछ नहीं है। सिर्फ़ दुनिया की नजर में यह मृत्यु है। हकीकत में यह जीवन, स्वयं के अस्तित्व तथा अपने महद रूप को जानना है। निश्चिंत रहिये इसके लिए हमें फांसी लगाना, जहर खाना, रेलगाड़ी के नीचे कट मरना, नदी में डूब मरना आदि नहीं है। अभ्यास द्वारा अपनी सारी प्राण ऊर्जा को एकत्रित करना है और उसे इस भौतिक शरीर से बाहर निकालना है। यह न तो कठिन है, न ही नामुमकिन और न ही कष्टप्रद। बल्कि इसका रस इतना आनन्ददायक है कि संसार के सारे रस तुच्छ लगेंगे।
इस रस को कैसे पाया जा सकता है? कैसे जीते जी मृत्यु को समझें………………
(अगले लेख में)
@विन्ध्येश्वरी
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