Tuesday, 24 November 2020

परमात्मा का दर्शन

कृष्ण गीता में कहते हैं- "स्व धर्मे निधनं श्रेयः पर धर्मों भयावहः।" बुद्ध कहते हैं- "धम्मं शरणं गच्छामि।" जीसस कहते हैं- "प्रेम ही धर्म है।" महावीर कहते हैं- "एष धम्मो सनातनो।" आखिर ये लोग किस धर्म के बारे में कह रहे हैं? क्या कृष्ण हिंदू, बुद्ध बौद्ध, जीसस ईसाई या महावीर जैन धर्म के बारे में कह रहे हैं। मेरा मानना है - "नहीं"।दरअसल हिंदू, बौद्ध, जैन, ईसाई, इस्लाम, पारसी, सिक्ख आदि धर्म ही नहीं हैं। ये परमात्मा को देखने के चश्मे मात्र हैं। जो व्यक्ति जिस चश्मे में पला बढ़ा उसे परमात्मा उसी रंग में दिखने लगा। ईसाई का परमात्मा जीसस जैसा है, हिंदू के लिये करोड़ों भगवानों जैसा, बौद्ध के लिये बुद्ध जैसा, जैन के लिये महावीर जैसा, मुस्लमान के लिये देवदूत मुहम्मद जैसा और निराकार, सिक्ख के लिये नानक और गुरुग्रंथ जैसा आदि। लेकिन ये सभी रामपुर गांव के चार अंधों से अधिक नहीं हैं जिन्होंने गांव में आये हुए हाथी को अलग-अलग तरह से अनुभव किया। जिस अंधे ने हाथी का पैर छुआ उसे हाथी खंभे जैसा लगा, जिसने कान छुआ उसे हाथी सूप जैसा लगा, जिसने पूंछ छुआ उसे हाथी झाड़ू जैसा लगा और जिसने पेट छुआ उसे नगाड़े जैसा लगा। अब चारों आपस में झगड़ रहे हैं। हाथी ऐसा है, हाथी वैसा है। आपको क्या लगता है इसमें से कौन सही और कौन गलत है? क्या आप इनमें से किसी अंधे को यह प्रतीति दिला सकते हैं कि हाथी हाथी जैसा है। संभवतः नहीं।

दरअसल सभी सही हैं और कोई भी सही नहीं है। हाथी को समग्रता में जानने के लिए दृष्टि चाहिए लेकिन दुर्भाग्य है वे सभी अंधे हैं। अब हाथी को समझने के दो तरीके हो सकते हैं चारों अंधे यह मान लें कि जो अनुभव चारों को हुआ है हाथी वैसा है। या फिर ऐसी दृष्टि विकसित किया जाये जिससे हाथी समग्रता में दिखे। हाथी तो सिर्फ हाथी जैसा है। उसकी कोई परिभाषा नहीं है। कोई परिभाषा हो भी नहीं सकती। सभी परिभाषाएं, सभी सिद्धांत, सभी परिकल्पनाएं द्वंद पैदा करेंगी।

परमात्मा भी ऐसा ही है। अपरिभाषेय, अपरिकल्पनीय, असैद्धांतिक। परमात्मा सिर्फ परमात्मा जैसा है। उसे सभी धर्मों की सार बातों को मिलाकर भी नहीं जाना जा सकता क्योंकि फिर भी कुछ छूट जाता है, कुछ कसक रह जाती है, कुछ कमी बच जाती है। परमात्मा को जानने के लिए अपनी दृष्टि चाहिए। जो निर्दोष हो, शांत हो। क्या आपको लगता है कि यदि हमारी आंख में दोष होगा तो परमात्मा पूर्ण रूप से दिख जायेगा या अगर हमारी आंख किसी दूसरी चीज को देख रही होगी तो परमात्मा दिख जायेगा? नहीं। बिल्कुल भी नहीं। क्योंकि अगर हम सिनेमा देख रहे और उस समय कोई हम से बात कर रहा हो या हमें कोई दूसरी चीज दिखा रहा हो तब हमारी आंख उस चीज को न तो देख पायेगी और कान उस बात को न सुन पायेगा। फिर हम उसे जान भी नहीं पायेंगे। इसी प्रकार परमात्मा भी शांत और निर्दोष चित्त में घटता है, यहीं उतरता है। या यूं कहें यहीं दिख जाता है। जैसे ही हम शांत होंगे, निर्दोष होंगे परमात्मा प्रकट हो जायेगा।परमात्मा का प्राकट्य, परमात्मा का साक्षात्कार "स्व धर्म" यानि स्वयं को जानने से होता है। इनमें से कोई भी धर्म स्वयं से साक्षात्कार करवाने में असमर्थ है। स्वयं को जानना के लिये हमें स्वयं पर भरोसा करना होगा और स्वयं उद्यम करना होगा। संसार में रहकर, सांसरिक कृत्य करते हुए भी संसार में उलझना नहीं है। जब हम सब कुछ देखते हुए भी अपनी प्रिय चीज को देख रहे होंगे तब सब कुछ देखते करते हुए भी हमें वही चीज दिखेगी। परमात्मा से प्रिय इस संसार में क्या हो सकता है? सब कुछ देखते हुए भी हमारी निर्दोष और शांत नजर बस उसी प्रियतम को ढूंढे। वह हमें दिखेगा ही दिखेगा।

@विन्ध्येश्वरी

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