मनुष्य अपने परम स्वरूप के साक्षात्कार से कितना दूर है?
बहुत दूर नहीं है। उसे अपने सभी नाटक छोड़ने होंगे या नाटक में अभिनय का साक्षी होना होगा, बस। हम आप नाटक देखते हैं। नाटक में कई सारे पात्र होते हैं। हर पात्र की अलग अलग भूमिका होती है, अलग अलग संवाद होता है, अलग अलग कहानी होती है। वह अपने अभिनय में शादी, विवाह, बच्चे, नौकरी, मारकाट सब करता है। कल्पना कीजिये कि वह अपने अभिनय में गहरे तक डूब जाये। वह अपने को वही मान बैठे जिस भूमिका में है। फिल्म में सीन है कि अभिनेता को अपने सहअभिनेता की पिटाई करनी है। वह सचमुच उसे पीटने लगे। शादी हुई, सुहागरात है, अभिनेता अभिनेत्री सचमुच सुहागरात मनाने लगे। अभिनेता मर गया और अपने को सचमुच मरा मान बैठे। क्या होगा? आप कहेंगे ऐसा नहीं होता। हां! मैं भी यही कहता हूँ ऐसा नहीं होता और न ही ऐसा होना चाहिए।
हम भी इस संसार में एक नाटक खेल रहे हैं। हम भी वही सब कर रहे हैं जो परदे पर अभिनेता करता है। लेकिन हमारी भूल यह है कि हम अपने अभिनय को सच्चा मान ले रहे हैं। जिस प्रकार अभिनेता अभिनय के दौरान अपने वास्तविक स्वरूप को ध्यान रखता है, मार पीट, शादी, विवाह, बच्चे सब दिखावटी होते हैं, वह मरकर भी मरता नहीं। उसे पता होता है कि यह सब एक खेल है। उसी प्रकार हमें अपने निज स्वरूप का ज्ञान रहना चाहिए। सब कुछ करते हुए भी अकर्ता का भाव होना चाहिए। पत्नी को पत्नी, पति को पति, बच्चों को बच्चा, माता-पिता को माता-पिता, नौकरी को नौकरी, मृत्यु को मृत्यु, जीवन को जीवन मान कर नहीं चलना चाहिए। यह सब सांसरिक अभिनय के एक घटक मात्र हैं। कहानी खत्म अभिनय खत्म। अभिनय कीजिये उसमें उलझिये नहीं।
अभिनेता को अपने वास्तविक स्वरूप में आने के लिए अपने अभिनय से निकलना होगा। उसे वह होना होगा जो वह वास्तव में है। प्रश्न उठता है - "हम क्या हैं?" हम वही हैं जिस रूप में हम पैदा हुए हैं, नग्न, भाषा विहीन, सांसारिक ज्ञान से हीन, छल-छ्द्म विहीन, प्यारी सी मुस्कान के साथ सहज भाव और वर्तमान में जीने की ललक। न आने वाले कल की चिंता न गुजरे कल का मलाल। बस आज और सिर्फ़ आज। कभी आपने विचार किया कि कोई बच्चा इतना प्यारा क्यों लगता है? यही ऊपर कहे गये कारण हैं। और ज्यादा कुछ नहीं। वह परमात्मा के अधिक करीब है। हम भी परमात्मा के करीब पहुंच सकते हैं। हम भी अपने आपको जान सकते हैं। तरीका यही कि जैसा प्रभु ने हमें भेजा हम वैसा हो जायें।
@विन्ध्येश्वरी
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