अर्जुन के बहुत कहने पर कृष्ण ने उसे अपना विराट रूप दिखाया। उसकी योग्यता न थी विराट-दर्शन की, साधना नहीं थी उसकी, उसने अपनी आंखों को परमात्मा के दर्शन के वियोग में रो रो कर लाल न किया था। उस राजकुमार अर्जुन की आंखें चुधिया गयीं। उसने कहा- हे प्रभु आप अपने इस विराट रूप को समेट लो मैं न देख पाऊंगा अब। क्या था उस विराट रूप में? पूरा ब्रह्मांड ही था। पृथ्वी, आकाश, नौ ग्रह, तारे, वृक्ष, पक्षी, देव, राक्षस, मनुष्य, प्रलय, सृजन, सुख, दुख, जीवन, मृत्यु सब कुछ था उसमें।
इस तथ्य का दूसरा पहलू यह भी है कि यदि यह सब कुछ परमात्मा में है तो क्या परमात्मा यही नहीं है? सच तो यही है यह सब परमात्मा के ही विभिन्न रूप हैं। अगर हम जन्म लेते हैं तो परमात्मा ही जन्म ले रहा है, हमारी मृत्यु में परमात्मा ही मरता है। हम सुखी हैं तो यह परमात्मा का ही सुख है और दुख भी परमात्मा ही है। सूरज का उगना और प्रकाश, पृथ्वी का घूर्णन और इस पर जीवन, पूर्णिमा का प्रकाश और चंद्रमा की शीतलता या अमावस्या की गहन रात्रि, वृक्षों का शांत स्थिर भाव से खड़े रहना या मस्ती से लहराना, पक्षियों की चहचहाहट, नदी का कलकल, भौरों का गुंजन, बच्चे की प्यारी मुस्कान या रुदन, प्रियतम का मधुर स्पर्श या दो घड़ी शुकून की नींद या सुबह की ताजगी। सब कुछ ही परमात्मा है। परमात्मा प्रतिपल हमारे पास है, उसे देखना सीख लो बस। उसे देखने के लिये अपनी नजर को निर्दोष रखना होगा। यानि उसमें किसी धर्म-मजहब, गुरु का मोतियाबिन्द न हुआ हो। वह चश्मा उतारना होगा जो किसी खास रंग का हो। उसे देखने के लिये निर्मल-अमल और शांत नजर चाहिए बस।
@विन्ध्येश्वरी
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