मैं कहता हूँ - "न है और तब न ही हो सकती जब तक कि अपने घर नहीं लौटोगे। अपने घर लौट आओ। वहाँ सर्वत्र सुख, शांति, प्रेम, आनन्द और विश्राम लबालब है।"
आप कहेंगे कि "क्या हम घर नहीं आये हैं या आते हैं? हम तो रोज शाम को अपने घर लौटते हैं, काम से थके-मांदे और कुछ कमाकर।"
"सच कहते हैं लेकिन एक आपका भौतिक घर है दूसरा आपकी आत्मा का घर है।"
"जिस प्रकार काम से थक-मांद कर आप घर लौटते हैं। वहां पत्नी, मां-पिता और बच्चों का प्यार मिलता है, पीने को एक गिलास पानी, खाने को खाना मिलता है, सुख से सोने के लिए बिस्तर मिलता है। ठीक उसी प्रकार जब आप अपने भीतर प्रवेश करते हैं तब वहां आपको चिरशांति, प्रेम, आनन्द और रस आदि प्राप्त होता है।"
"इसके लिये आपको कुछ खास नहीं कर होता है। बैठ कर या लेट कर बस अपने आपको ढीला छोड़ देना है। सांस शिथिल, शरीर शिथिल। फिर विचारों को भी ढीला छोड़ देना है। विचार थोड़े हठी होते हैं। जब आप इनका साथ देते तब ये आपके साथ रहते हैं। बस इन्हें आने दीजिये और जाने दीजिये। इन्हें आता-जाता देखिये। कोई इनसे मिलिये मत। सिर्फ़ विचारों को देखिये। आप पायेंगे कि विचार एकदम शांत हो गये हैं। जिस क्षण शरीर, मन और विचार शांत होगें, उसी क्षण आप अपने भीतर प्रविष्ट हो जायेंगे। आपको अपना असली घर मिल जायेगा।"
@विन्ध्येश्वरी
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