Wednesday, 14 October 2020

प्रेम के स्तर

प्रेम के तीन स्तर होते हैं-शारीरिक(भौतिक), मानसिक और आत्मिक।

शारीरिक प्रेम(?):- इसके तीन स्तर हैं-
1- शारीरिक भूख को शांत करने के लिये किसी से संबध बनाते हैं तब यह भी क्षणिक ही होता है, अस्थायी। जैसे वेश्या के साथ बनाया गया संबंध।
2- जब हम बिना एक दूसरे को समझे - जाने मात्र बड़े बुजुर्गों की सहमति से मिलते हैं तब एक समझौता होता है- लोगों से, अपने आप से। समाज क्या कहेगा, चार लोग क्या कहेंगे, शादी तो करनी पड़ती है आदि। इसमें हम केवल सामाजिक दबाव में बंधे पड़े रहते हैं और जैसे तैसे जीवन को काट रहे होते हैं।
3- और जब हम किसी के रूप-रंग, बोली, कटीले नयन नक्श आदि से प्रभावित होकर प्रेम करते हैं तब यह भी शारीरिक ही होता है। यानि यह भी स्थायी नहीं हो सकता क्योंकि शारीरिक आकर्षण ज्यादा दिन बना नहीं रह सकता है।

इस प्रकार शारीरिक प्रेम (?) को प्रेम मानना मूढ़ता है।

भारतीय समाज ने "समझौता से मिलन" को स्वीकार किया। इसलिए यहाँ बड़े बुजुर्गों की सहमति से विवाह प्रचलित है। इसका नतीजा यह हुआ कि सामाजिक दबाव के कारण विवाह स्थायी तो हुआ लेकिन हर व्यक्ति अंदर से घुट रहा होता है। चाहे वह स्त्री हो या पुरुष। हर स्त्री-पुरुष को हम यह कहते सुनते हैं कि "तुम्हारे साथ पड़ कर मेरी जिंदगी बर्बाद हो गयी" "मेरे करम फूटे थे जो तुम मिले/मिली" आदि। और साथ ही लगभग हर स्त्री-पुरुष हर स्त्री-पुरुष को संभावित अच्छे जीवनसाथी के रूप में देखता है और अपने वाले को कमतर नजर से। यह पिंजरे में बंद पक्षी जैसा हाल है न उड़ सकता है न पिंजरे में रह सकता है।

इसके विपरीत कुछ समाजों में "शारीरिक आकर्षण" से विवाह को स्वीकार किया गया है जैसे पश्चिमी देश। दुर्भाग्य यह है कि कोई भी सुंदरता पूर्ण नहीं होती। आज ये अच्छा लग रहा/रही है, कल कोई और, परसों कोउ और। यहाँ व्यक्तिगत उच्छृंख्लता/वासना की पूर्ति तो हो गयी लेकिन समाज अस्थिर हो गया।

मानसिक प्रेम:- जब शारीरिक आकर्षण मन के स्तर पर उतर जाता है तब यह मानसिक प्रेम में परिणत हो जाता है। मानसिक प्रेम कहीं न कहीं शारीरिक स्तर से ही शुरू होता है किंतु इसे भी स्थायी नहीं माना जा सकता क्योंकि मन चंचल है क्या पता कब किस पर मर मिटे। हीर-रांझा, लैला-मजनूं, शीरी-फरहाद आदि इसी श्रेणी के प्रेमी-प्रेमिका हैं।

आत्मिक प्रेम:- यह प्रेम चित्त की अवस्था है। यहाँ कोई अपना पराया नहीं होता। हर किसी के लिए प्रेम छलकता है। निर्जन-सजन हर जगह, जीव-अजीव हर किसी पर। संतों का प्रेम इसी कोटि का होता है। एक अर्थ में माता का प्रेम भी आत्मिक प्रेम होता है। यह प्रेम की पूर्णावस्था है।

प्रेम की पूर्णावस्था तक पहुंचने की यात्रा शारीरिक और मानसिक स्तर से होकर ही गुजरती है (किंतु सदैव ऐसा अपेक्षित नहीं है)। तुलसी का राम के प्रति अनुराग अपनी पत्नी रत्नवली से दुत्कार खाने के बाद जगा। मीरा का कृष्ण के प्रति प्रेम सुयोग्य पति और ससुराल न मिलने के कारण जगा। सूर का कृष्ण के प्रति सख्य भाव समाज में अपेक्षित सम्मान/सखा न मिलने के कारण हुआ।

स्त्री अपने पति से शारीरिक स्तर पर ही प्रेम कर पाती है। कुछेक स्थितियों में मानसिक भी हो सकता है किंतु आत्मिक स्तर पर वह सिर्फ़ अपनी संतान से जुड़ती है। इसलिये अक्सर देखा जाता है कि माँ बनने के बाद स्त्री का पुनर्जन्म होता है। वह पहले से अधिक आकर्षक और शांत हो जाती है। लेकिन आत्मिक प्रेम को उपलब्ध हो जाने के बाद शारीरिक प्रेम में उसकी रूचि कम होने लगती है। पति को यह महसूस होने लगता है कि वह उसकी तरफ पहले जितना ध्यान नहीं दे रही है।

@विन्ध्येश्वरी

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