Wednesday, 23 December 2020

पीढियों का अंतर्द्वंद

हमारे माता-पिता अपने माता-पिता के सपनों, अरमानों को जी रहे थे, हम अपने माता-पिता के और हमारे बच्चे हमारे सपनों और अरमानों को ढोयेंगे। लोग अपने ही सपनों को नहीं जी पाते फिर दूसरों के सपनों की कौन कहे। यह समस्या हजारों सालों से पीढ़ी दर पीढ़ी हम ढोते चले आ रहे हैं। हमारे माता-पिता के माता-पिता अपने समय के सपने 20-30 साल बाद अपने बच्चों से पूरा करवाने की जिद पाले थे। यही अपेक्षा हमारे माता-पिता हमसे करते हैं और यही हम अपने बच्चों से करेंगे। हम अपने पुराने सपने नये दौर में देखने की जिद करते हैं जो कि अप्रासंगिक हैं।

आज से 50 साल पहले का समय और उसकी मांग आज के समय से भिन्न थी। आज के 50 साल बाद समय और उसकी मांग भिन्न होगा ही। हम क्यों अपने बच्चों को 50 साल पुराने सपने देखने पर मजबूर करते हैं। हर आदमी के अपने सपने होते हैं, उन्हें खुद पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए। अगर न हो पाये तो नियति मानकर भूल जाना चाहिए किंतु नयी फसल को पुराने मौसम के नाम पर कुर्बान नहीं करना चाहिए। जब हम दूसरे से अपने सपने पूरा करने का सपना संजोते हैं तो अक्सर इसकी परिणति विषाद पूर्ण ही होती है। इसी कारण हर माता-पिता अपने बच्चों से दुखी होते हैं। इसीलिये दोनों के बीच वैमनस्य, कलह और अन्तर्द्वन्द चलता रहता है। इस समस्या से मुक्ति का एकमात्र उपाय है, खुद को दूसरे के अरमानों और सपनों से मुक्त करो और अपनी संतानों को उनके अपने सपने और अरमान जीने दो। मत थोपो उनपर अपने जीर्ण सपने। 
©विन्ध्येश्वरी

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