Wednesday, 23 December 2020

संसार क्या है?


यह संसार हमारी ही निर्मिति है। हमारे विचार, हमारी इच्छाएं, हमारी वासनाएं इसे निर्मित करती हैं। आपको क्या लगता है कि कोई स्त्री या पुरुष सुंदर है? नहीं हमारी वासना उसे सुंदर या असुंदर बनाती है। एक ही वस्तु किसी को अच्छी या बुरी लगती है। क्या वह वस्तु अच्छी या बुरी है? नहीं हमारी धारणा उसे वह गुण प्रदान करती है। अर्थात जो वस्तु जैसी है हम उसे वैसा नहीं देख पाते। हमारे इंद्रिय रूपी प्रोजेक्टर संसार रूप परदे पर फिल्म भरते हैं और यह प्रोजेक्टर वह फिल्म दिखाता है जैसा हमारे विचार, संस्कार हैं। अगर हमारे सामने कोई बुरा या अच्छा दृश्य दिखता है या हमें कोई चीज़ बुरी या अच्छी लगती है तो इसका अर्थ है कि उस वस्तु में उक्त गुण हम प्रविष्ट करा रहे हैं। वह वस्तु तो जैसी है बस वैसी है।

एक पत्थर में किसी ईसाई मूर्तिकार को जीसस दिखेगा तो हिंदू को राम या कृष्ण, बौद्ध को बुद्ध तो जैन को महावीर। मुस्लमान को उसमें कुछ न दिखेगा। वह उससे मस्जिद बनाने की सोचेगा। अगर कोई बहेलिया उस पत्थर को देखेगा तो उसे चिड़िया मारने वाले कंकड़ में बदल लेगा लेकिन सड़क बनाने वाले को वही पत्थर सड़क निर्माण की कच्ची सामग्री प्रतीत होगा। मकान बनाने वाला उसी से मकान बनायेगा। आपको क्या लगता है वह पत्थर इनमें से क्या है? सच तो यह है कि पत्थर सिर्फ पत्थर है। उसे नाना प्रकार का आकार और कार्य सिर्फ हम देते हैं। यह संसार हमारी ही कल्पना, वासना, विचार और इच्छा का विस्तार है।

@विनय नमन🙏

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