स्वप्रेम-1
स्वप्रेम क्या है?
पहले स्व का अर्थ -
स्व का अर्थ है "आप" यानि चैतन्य जो आपके भीतर मौजूद है। चैतन्य यानि परमात्मा का अंश। यह एक तरह से बूंद और सागर सा संबंध है। तुलसीदास ने इसे ही कहा है - "ईश्वर अंस जीव अविनासी।" किंतु आप सिर्फ आत्मा नहीं हैं। आत्मा का एक आवरण है आपका शरीर। यद्यपि आप शरीर ही नहीं हैं। शरीर एक आवरण मात्र है किंतु है महत्त्वपूर्ण। इसी शरीर के माध्यम से ही आप अपने आत्मतत्व को जान पायेंगे। अर्थात प्रथम दृष्ट्या आप शरीर और आत्मा दो तल पर हैं।
मनुष्य अपने जन्म के समय शरीर के तल पर शून्य होता है वह आत्मा के तल पर जीता है। जैसे-जैसे उसका विकास होता जाता है, सामाजीकरण की प्रकिया के तहत वह आत्मा के तल से दूर हटता जाता है और शरीर के तल पर प्रविष्ट होता जाता है। एक समय के बाद वह आत्मा को भूल ही जाता है सिर्फ वह देह रह जाता है। इस प्रक्रिया में ज्यों-ज्यों वह आत्मा के तल से दूर हटता जाता है उसके अंदर विकारों के विकृति की आवृत्ति बढ़ती जाती है। ये विकार जैसे - काम, क्रोध, मोह, लोभ, मद आदि मूलतः न तो बुरे हैं और न ही अच्छे। ईश्वर द्वारा निर्मित कोई भी तत्व अच्छा बुरा नहीं है, उसे अच्छा या बुरा बनाती है हमारी दृष्टि और हमारे संस्कार। ये ऊर्जा के स्रोत हैं।
जब हम आत्मा के तल पर जीते हैं तब यही काम की ऊर्जा परमात्मा के लिए, क्रोध की ऊर्जा करुणा में, मोह ऊर्जा प्रेम में, लोभ ऊर्जा दान में, मद की ऊर्जा दया में परिणत हो जाती है। वहीं जब हम शरीर के तल पर जीते तब काम के ऊर्जा अतिशय संभोग में, क्रोध ऊर्जा विनाश में, मोह ऊर्जा बंधन में, लोभ ऊर्जा भ्रष्टाचार में, मद की ऊर्जा परपीडन में बदल जाती है।
जब मनुष्य एकदम देह के तल पर पहुंचता है तब वह समस्त विकारों से ग्रस्त एक दानव के रूप में बदल जाता है। ऐसा दानव जो पूरी मनुष्यता के लिये खतरा है। ऐसा सहस्राब्दियों में कभी कभार घटता है। जैसे रावण, हिटलर, मुसलोलिनी आदि। सामान्य मनुष्य इन दोनों के मध्य जूझता रहता है। आधा मानव आधा दानव। यदि हमें स्व से प्रेम करना है तब सबसे पहले हमें अपने मूल रूप को पहचानना होगा। हमारे व्यक्तित्व का झुकाव किधर है।
(क्रमशः)
@विनय नमन
No comments:
Post a Comment