Monday, 29 September 2025

भारत की सबसे बड़ी समस्या : सामूहिक चेतना का अभाव

भारत एक प्राचीन संस्कृति और सभ्यता वाला राष्ट्र है। यहाँ वेदों, उपनिषदों, गीता और महापुराणों की परंपरा रही है, जिन्होंने मानवता को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ जैसे उच्च आदर्श दिए। किंतु दुःखद विडम्बना यह है कि आज भारतीय समाज अपनी जड़ों से कटकर एक ऐसे दौर में प्रवेश कर गया है जहाँ सामूहिक चेतना (Collective Consciousness) का गंभीर अभाव दिखाई देता है। लोग अपने निजी जीवन, व्यक्तिगत लाभ और छोटे-छोटे स्वार्थों तक ही सीमित हो गए हैं। समाज, राष्ट्र और सार्वजनिक हितों के प्रति उदासीनता बढ़ती जा रही है। यही कारण है कि भ्रष्टाचार, अव्यवस्था, सार्वजनिक सम्पत्तियों की दुर्दशा और समाज-विरोधी तत्वों का वर्चस्व बढ़ रहा है। सामूहिक चेतना क्या है? सामूहिक चेतना से तात्पर्य है—समाज के प्रत्येक व्यक्ति का यह बोध कि वह किसी बड़े तंत्र या व्यवस्था का हिस्सा है और उसकी जिम्मेदारी केवल अपने लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र के लिए भी है। यह चेतना हमें बताती है कि सार्वजनिक सम्पत्ति मेरी भी है, राष्ट्र की गरिमा मेरी भी जिम्मेदारी है, और कानून-व्यवस्था का पालन केवल मजबूरी नहीं बल्कि मेरा कर्तव्य है।
भारत में सामूहिक चेतना का अभाव – कुछ उदाहरण 1. सार्वजनिक सम्पत्ति के प्रति उदासीनता रेलवे स्टेशन, बस अड्डे, सरकारी स्कूल, अस्पताल और सड़कें – यह सब जनता के टैक्स से निर्मित होती हैं। लेकिन इनकी देखभाल में हममें से बहुत कम लोग रुचि लेते हैं। ट्रेन की सीटों पर नाम लिखना, सरकारी भवनों की दीवारों पर पान-गुटखा थूकना, सड़क पर कचरा फेंकना आम व्यवहार बन गया है। 2. सार्वजनिक मुद्दों पर चुप्पी भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, लापरवाही, नियमों की अनदेखी जैसी समस्याएँ सबको दिखाई देती हैं। लेकिन हममें से अधिकांश लोग इन्हें ‘सिस्टम की समस्या’ कहकर किनारा कर लेते हैं। हम सोचते हैं कि “जब सब ऐसा कर रहे हैं, तो मैं अकेला क्यों आवाज़ उठाऊँ?” 3. व्यक्तिगत स्वार्थ सर्वोपरि ट्रैफिक सिग्नल तोड़ना, सड़क पर गाड़ी गलत दिशा में चलाना, ट्रैफिक नियमों की अवहेलना, लाइन तोड़ना, अवैध काम करवाने के लिए घूस देना – ये सब व्यक्तिगत स्वार्थ के उदाहरण हैं। ऐसे छोटे-छोटे स्वार्थ जब समाज में बढ़ जाते हैं, तो बड़े अपराध और सामाजिक अन्याय को भी जगह मिलती है। 4. दुर्जनों का वर्चस्व जब समाज के सज्जन व्यक्ति चुप रहते हैं और केवल अपने हितों में लगे रहते हैं, तब दुष्ट, शोषक और भ्रष्ट लोग निर्भीक होकर आगे बढ़ते हैं। यही कारण है कि राजनीति और प्रशासन में आज भी अनेक भ्रष्ट व असामाजिक तत्व हावी हो जाते हैं। सामूहिक चेतना के अभाव के कारण 1. औपनिवेशिक मानसिकता अंग्रेज़ों ने भारत को 200 वर्षों तक शोषित किया। उन्होंने जनता को यह विश्वास दिलाया कि सरकार ‘हमारी नहीं’ बल्कि ‘विदेशियों की’ है। स्वतंत्रता के बाद भी यह मानसिकता पूरी तरह नहीं बदली। आज भी लोग मानते हैं कि “सरकारी चीज़ किसी की नहीं होती,” जबकि असलियत यह है कि सरकारी संपत्ति सबसे पहले हमारी अपनी है। 2. शिक्षा व्यवस्था की विफलता हमारी शिक्षा ज्ञान तो देती है, लेकिन चरित्र और सामाजिक जिम्मेदारी का बोध नहीं कराती। स्कूल और कॉलेजों में बच्चों को यह सिखाया ही नहीं जाता कि राष्ट्रहित और समाजहित उनके जीवन का अनिवार्य हिस्सा होना चाहिए। 3. अत्यधिक व्यक्तिवाद और उपभोक्तावाद आधुनिक समय में प्रतिस्पर्धा, आर्थिक लालसा और उपभोक्तावादी संस्कृति ने व्यक्ति को केवल अपने करियर, अपनी कमाई और अपने आराम तक सीमित कर दिया है। “मैं और मेरा परिवार” से बाहर सोचने की प्रवृत्ति कमजोर पड़ चुकी है। 4. कानून के प्रति उदासीनता भारत में कानून का पालन करने की मानसिकता अभी भी कमजोर है। यहाँ लोग नियमों को तोड़ने को चतुराई और शान का विषय समझते हैं। जब तक सख्त दंड न मिले, तब तक नियमों का पालन नहीं किया जाता। और जितने अधिक सख्त नियम उतना अधिक भ्रष्टाचार। 5. सामाजिक संगठन और नेतृत्व का अभाव पश्चिमी देशों में नागरिक संगठन और लोक-आंदोलन बहुत सक्रिय रहते हैं। वे सरकार को जवाबदेह बनाते हैं। भारत में ऐसी परंपरा बहुत कमजोर है। यहाँ जनता अपने अधिकारों और कर्तव्यों के लिए संगठित नहीं होती।
सामूहिक चेतना के अभाव के दुष्परिणाम 1. भ्रष्टाचार का प्रसार जब जनता ही रिश्वत देने में संकोच नहीं करती, तब अधिकारी भी निर्भीक होकर रिश्वत लेते हैं और इसे अपना अधिकार समझते हैं। यदि कोई नहीं देना चाहता है तो उसे जबरन देना पड़ता है। समाज चुपचाप इसे स्वीकार करता है, और धीरे-धीरे यह व्यवस्था का हिस्सा बन जाता है। 2. सार्वजनिक सम्पत्ति की दुर्दशा सड़कें गड्ढों से भर जाती हैं, स्कूलों और अस्पतालों की हालत जर्जर हो जाती है, रेल की बोगियाँ गंदी रहती हैं – क्योंकि जनता इन्हें अपना नहीं मानती और सरकार भी जानती है कि जनता सवाल नहीं पूछेगी। 3. सामाजिक असमानता और शोषण जब सामूहिक चेतना कमजोर होती है, तो गरीब और कमजोर वर्गों का शोषण बढ़ता है। समाज के ताकतवर लोग नियमों को अपने पक्ष में मोड़ लेते हैं। 4. राष्ट्रीय प्रगति में बाधा सामूहिक चेतना की कमी के कारण प्रतिभा और संसाधन व्यर्थ चले जाते हैं। कोई भी देश तभी आगे बढ़ सकता है जब उसकी जनता मिलकर काम करे। लेकिन भारत में हम व्यक्तिगत लाभ के लिए मिलकर राष्ट्रीय हित की अनदेखी कर देते हैं। 5. नैतिक पतन जब लोग केवल अपने बारे में सोचते हैं, तो सत्य, ईमानदारी, करुणा और सहानुभूति जैसे मानवीय मूल्य खो जाते हैं। यह समाज को भीतर से खोखला बना देता है। समाधान : सामूहिक चेतना कैसे विकसित हो? 1. शिक्षा में सुधार शिक्षा केवल अंकों और डिग्रियों तक सीमित न हो। इसमें नैतिक शिक्षा, सामाजिक जिम्मेदारी और नागरिक कर्तव्यों का बोध कराया जाए। बच्चों को छोटी उम्र से ही यह सिखाना होगा कि सार्वजनिक सम्पत्ति की रक्षा करना उनका कर्तव्य है। 2. धर्मनीति का पालन धर्म हमें न केवल ईश्वर से जोड़ता है बल्कि यह हमें नैसर्गिक रूप से सचरित्र और नीतिवान बनाता है। समाज में धर्म का अभाव घोर दुश्वृतियों को जन्म देता है। 3. सामाजिक आंदोलन और संगठन हमें ऐसे नागरिक संगठनों को बढ़ावा देना होगा जो सार्वजनिक मुद्दों पर आवाज़ उठाएँ। जब जनता संगठित होकर प्रश्न पूछेगी, तभी व्यवस्था बदलेगी। 4. सख्त कानून और अनुशासन नियम तोड़ने वालों के प्रति सख्त कार्रवाई जरूरी है। जब तक लोग कानून का सम्मान नहीं करेंगे, तब तक सामूहिक चेतना मजबूत नहीं हो सकती। 5. मीडिया और जनजागरूकता मीडिया का दायित्व है कि वह जनता को जागरूक करे। टीवी, रेडियो, अख़बार और सोशल मीडिया के माध्यम से यह संदेश बार-बार दिया जाना चाहिए कि राष्ट्रहित व्यक्तिगत हित से बड़ा है। 6. सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मूल्यों की ओर लौटना भारतीय संस्कृति हमेशा से सामूहिकता पर आधारित रही है। “एकम् सत् विप्रा बहुधा वदन्ति”, “वसुधैव कुटुम्बकम्” जैसे आदर्श फिर से जनमानस में स्थापित करने होंगे। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी हमें यह समझना होगा कि हम सब एक ही ब्रह्म के अंश हैं। 7. व्यक्तिगत पहल परिवर्तन की शुरुआत प्रत्येक व्यक्ति को अपने स्तर से करनी होगी। यदि हम स्वयं नियमों का पालन करेंगे, कचरा सही स्थान पर डालेंगे, रिश्वत नहीं देंगे, सार्वजनिक सम्पत्ति की रक्षा करेंगे और दूसरों को प्रेरित करेंगे, तभी सामूहिक चेतना जागृत होगी। निष्कर्ष भारत की सबसे बड़ी समस्या गरीबी, बेरोजगारी या भ्रष्टाचार नहीं है। इन सबकी जड़ में है – सामूहिक चेतना का अभाव। जब तक हम केवल अपने छोटे-छोटे स्वार्थों तक सीमित रहेंगे, तब तक समाज और राष्ट्र की समस्याएँ बढ़ती रहेंगी। हमें यह समझना होगा कि “मैं” और “हम” के बीच की खाई को पाटे बिना सच्ची प्रगति संभव नहीं। यदि प्रत्येक भारतीय यह संकल्प ले कि वह समाज और राष्ट्रहित को व्यक्तिगत हित से ऊपर रखेगा, तो भारत फिर से विश्वगुरु बन सकता है। लेकिन इसके लिए हमें अपने भीतर सोई हुई सामूहिक चेतना को जगाना होगा। यही हमारे समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

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