Sunday, 24 May 2020

परमात्मा का स्तर


क्या प्रभु का लेवल सिर्फ इतना है कि "लोग कुछ मंत्रों या आयतों (कुरान) या पैरा (बाइबिल) के माध्यम से उसे भजें और कुछ फल-फूल, दक्षिणा चढ़ायें जिससे वह खुश हो जाये और उनके जीवन में सब मंगल मंगल हो जाये।" इतना सस्ता और घटिया प्रभु? ठीक किसी दफ्तर के घूसघोर क्लर्क या चपरासी की तरह जो घूस लेकर लोगों की फाइल खिसकाता है! परमात्मा के प्रति हमारी आस्था कितनी लिजलिजी और ज़लील है! वैसे ही जैसे हमारे पास परमाणु का भंडार हो, हम उसे जलाकर हाथ सेंकने का काम कर रहे हों।

हम उसे तुच्छ चीजें (फल, फूल, दक्षिणा) अर्पित करके और उससे बदले में धन, दौलत, संपन्नता, सुख, समृद्धि मांग कर कदम कदम पर उस परमशक्ति को जलील और अपमानित करते हैं। यह ठीक वैसे है जैसे एक पिता द्वारा दिये गये मोटर साइकिल के खिलौने को उसका बेटा उसे अर्पित करके वास्तविक मोटरसाइकिल मांगें।

हम प्रभु से कैसी अटपटी और बेहूदा मांगें करते हैं "लाला तुम जुग जुग जियो।" लाला युग युग जीकर क्या करेगा। ईश्वर भी बेचारा असमंजस में पड़ जायेगा। यार मैं तो खुद युग युग नहीं जी पाया (राम, कृष्ण, परशुराम आदि) अब इसे कैसे युग युगांतर तक जीवित रखूं?

परमात्मा कोई व्यक्ति नहीं है। वह नियम है। ठीक विज्ञान के नियमों की तरह। विज्ञान वस्तुतः कुछ नहीं है वह भी नियम है। उसके नियम कायदों पर चलकर विज्ञान तत्व को जाना जा सकता है। नये नये अविष्कार किये जा सकते हैं। परमात्मा को भी उसके नियमों पर चलकर जाना जा सकता है।

प्रश्न है "इन नियमों को जाना कैैसे जाये?" इसका उत्तर यह है जिस प्रकार विज्ञान संबंधी नियम इस सृष्टि में भरे पड़े हैं। जिन्हें जानने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण की आवश्यकता है। इसी प्रकार परमात्मा संबंधी नियम इस सृष्टि में यहां तक कि हम सबके भीतर भी भरा पड़ा है बस आवश्यकता है अपने भीतर ईश्वरीय चेतना, ईश्वरीय दृष्टिकोण विकसित करने की। लेकिन हम फंसे हुए हैं फालतू के ढकोसलों में, बेवजह के देवताओं और भगवानों के चक्कर में।

वह परमात्मा इन तुच्छताओं से ऊपर है। अगर हम कुछ अर्पित करते हैं या नहीं करते हैं, उसे कुछ फर्क नहीं पड़ता। उसे इससे भी फर्क नहीं पड़ता कि कौन सा व्यक्ति क्या चढ़ाता कितना चढ़ाता है क्यों नहीं चढ़ाता। बल्कि वह न चढ़ाने पर ज्यादा खुश होता होगा। वह न तो कुछ देता है न लेता है। हम खुद ही इस जगत के कर्ता, धर्ता और उपभोक्ता हैं, किंतु हम खुद ही कुछ नहीं हैं। यही इस संसार का रहस्य है।

समुद्र का निर्माण अनन्त बूंदों से हुआ है। बूंदों के अतिरिक्त समुद्र कुछ नहीं है। बूंदे भी कुछ नहीं महज उस विशाल समुद्र से निकले एक कण के सिवा। परमात्मा भी अनन्त आत्माओं के संग्रह के सिवा कुछ नहीं है और ये आत्माएं उसी परमात्मा से उत्पन्न हुई हैं। बूंद समुद्र को कभी जान नहीं सकती अगर वह अपने "बूंदपन" को छोड़ने के लिये राजी न हो। और जब बूंद का "बूंदपन" (अहम) खत्म हो जाता है तब वह समुद्र हो जाती है। उसी में विलीन हो जाती है।

परमात्मा को जानने के लिए जीवात्मा को अपना "जीवपन" छोड़ना पड़ेगा। उससे जानना पड़ेगा कि वह अनन्त परमात्मा का हिस्सा है। लेकिन हमारे मन मस्तिष्क और रोम - रोम में परमात्मा की गलत अवधारणा घर कर चुकी है। हमने उसे अपने अनुसार ढाल लेने का प्रयत्न किया है। परंतु क्या बूंद अपने में समुद्र को ढाल सकती है? या समुद्र बूंद में ढल सकता है? कतई नहीं। फिर वह हमसे दूर चला जायेगा क्योंकि हमारे पास उसे अपने में समाहित करने की पात्रता नहीं है। यही कारण है कि मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च में जाकर, लाख लाख भक्तिगीत गाकर, तमाम चढ़ावे चढ़ाकर भी कोई परमात्मा को उपलब्ध नहीं हुआ।

अपने मस्तिष्क में चढ़े भ्रम के आवरण को तोड़िये। परमात्मा को खंडित रूप में नहीं पूर्ण रूप में स्वीकार कीजिये। और फिर पूर्ण हो जाइये।

©विन्ध्येश्वरी

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