Saturday, 23 May 2020

क्या ईश्वर है?


मेरे एक विज्ञानवादी मित्र ने कहा कि "क्या आप ईश्वर को सिद्ध कर सकते हैं?"

मैंने कहा "नहीं" । लेकिन क्या आप विज्ञान को सिद्ध कर सकते हैं?

उन्होंने कहा "हाँ"।

मैं - "फिर बताइये विज्ञान क्या है?"

उन्होंने वही परंपरागत परिभाषा दुहरायी "क्रमबद्ध सुव्यवस्थित एवं तर्कसंगत ज्ञान विज्ञान है।"

मैंने कहा "इसमें विज्ञान कहाँ है? क्रमबद्ध तो कोई भी चीज हो सकती है, जैसे एक कतारबद्ध पेड़, ट्रेन की पटरी, किताब के पन्ने आदि क्या यह विज्ञान है? सुव्यवस्थित बिस्तर क्या विज्ञान हो सकता है? तर्कसंगत ज्ञान कुछ अस्पष्ट सा है। क्या अगर कोई बच्चा यह पूछे कि अक्षर "क" को क्यों इसी तरह लिखा जाता है तो क्या यह विज्ञान है?"

उनका उत्तर था कि "इसमें से कोई भी अलग अलग विज्ञान नहीं है। इनका सम्मिलित रूप ही विज्ञान है। विज्ञान एक नियम है।"

"क्या विज्ञान को छू सकते हैं, देख सकते हैं, महसूस कर सकते हैं, या सुन सकते हैं?" - मैंने पूछा।

उन्होंने कहा- "नहीं। विज्ञान अदृश्य है, अस्पृश्य है, अश्रवण है, लेकिन जब आप विज्ञान के द्वारा निर्मित कोई वस्तु देखते, सुनते या छूते हैं तब आप विज्ञान से ही रूबरू हो रहे होते हैं।"

"यानि विज्ञान कोई चीज नहीं है। बल्कि सिर्फ़ यह सोच है। जब आप किसी चीज को वैज्ञानिक तरीके से सोचते हैं और उस पर प्रयोग करते हैं तब वह मूर्त रूप में परिणत होता है। संसार भर में फैली भौतिक वस्तुएं विज्ञान का ही मूर्त रूप हैं। विज्ञान की अपनी कोई शक्ति नहीं है बल्कि वह किसी वैज्ञानिक के मस्तिष्क में सवार होकर साकार हो जाता है। विज्ञान स्वतंत्र रूप से कुछ नहीं कर सकता लेकिन जब विज्ञान में विशेष रुचि रखने वाला कोई व्यक्ति किसी अवधारणा या सिद्धांत पर काम करता है तब वह अपरिमित शक्ति धारण कर लेता है।" - यह लंबा सा स्टेटमेंट मैंने दिया।

उन्होंने हामी में सिर हिलाया और हल्के से मुस्कराये। फिर कहा -" आपने बहुत सही कहा।"

मैंने कहा-" मित्र! यह आपकी ही बात की व्याख्या है। जो मेरे बड़े काम की बात है।"

"वस्तुतः विज्ञान और भगवान में कोई बहुत अंतर नहीं है। अंतर है हमारे पूर्वाग्रह का और दोनों की प्रकृति में। हम विज्ञान को एक नियम मानते हैं, क्रमबद्ध सुव्यवस्थित एवं तर्कसंगत ज्ञान मानते हैं, वैज्ञानिक सिद्धांतों का प्रयोगात्मक रूप विज्ञान का मूर्त स्वरूप होता है। वह किसी मनुष्य के मस्तिष्क में सवार होकर साकार होता है। ठीक ऐसे ही ईश्वर भी एक नियम है, वह सत (जो सदा से रहा है), चित (चेतना युक्त), आनंद (कभी न नष्ट होने वाली खुशी) स्वरूप है, यह पूरी प्रकृति उसका मूर्त रूप है, वह भी किसी आध्यात्म में रुचि रखने वाले व्यक्ति के मन, मस्तिष्क और आत्मा में सवार होकर साकार होता है।"

"आपने तो मुझे कंफ्यूज कर दिया। अब मैं वैज्ञानिक बात को मानूं या आध्यात्मिक बात को। अब तो दोनों एक जैसे लगते हैं।" उन्होंने अविश्वास से कहा।
मैंने कहा - "विज्ञान भी मूलतः प्रकृति या कहें कि ईश्वर को जानने का उपकरण है। फर्क सिर्फ इतना है कि विज्ञान "nul hypothesis" (शून्य परिकल्पना) यानि ईश्वर नहीं है" से अपना शोध शुरू करता है और आध्यात्म "alternative hypothesis" (कुछ तो है) यानि "ईश्वर है" से अपना शोध शुरू करता है। विज्ञान निगमनिक पद्धति से यानि बाहरी दुनिया को समझ कर ईश्वर और उसके रहस्य को जानना चाहता है जबकि आध्यात्म आगमनिक पद्धति से यानि भीतरी दुनिया में प्रवेश कर उसे समझना चाहता है। विज्ञान और आध्यात्म दोनों ही सत्य और आनंद की खोज में जुटे हुए हैं। लेकिन विज्ञान भौतिक वस्तुओं जैसे मोबाइल, कार, एसी, कूलर आदि से आनंद प्राप्त करना चाहता है और आध्यात्म इन सबसे निवृत्त होकर।"

लेकिन यह पूजा - पाठ, तंत्र - मंत्र, पंडे - पुजारी, साधु- महात्मा, मंदिर - मस्जिद? ये सब क्या है?"- उन्होंने अपनी आंखों को सिकोड़ते और फैलाते हुए प्रश्न किया।

"यह ठीक वैसे ही है जैसे विज्ञान पढ़ाने के लिए अध्यापक होते हैं, शोध करने के लिए वैज्ञानिक होते हैं, प्रयोगशालाएं होती हैं, प्रयोग होता है, उनकी सहायता के लिए सहायक होते हैं, विज्ञान लेखक होते हैं………।"-मैं अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था उन्होंने झपटते हुए पूछा -"लेकिन ये पंडे पुजारी मौलवी पादरी आदि तो पाखंड करते हैं, ढकोसला करते हैं, आडबंर फैलाते हैं। इसका क्या?"

"इसकी भी वजह है। क्या आप दावा कर सकते हैं कि सभी वैज्ञानिक, शिक्षक, प्रयोगशालाएं एक ही स्तर की हैं? मुझे लगता है आप नहीं में ही उत्तर देगें?"……

उन्होंने हाँ में सिर हिलाया।

मैंने अपनी बात पुनः शुरू किया - "ठीक ऐसे ही मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च आदि भी ईश्वर को प्राप्त करने के लिए प्रयोगशालाएं हैं। पंडित, पुजारी, मौलवी, पादरी, साधु, संत, फकीर आदि उसके वैज्ञानिक, शिक्षक आदि हैं। लेकिन उनका स्तर एक समान नहीं है। किंतु वे अपनी मूढ़ता को अपने आडंबर के आवरण में छिपाते हैं। हम भी मूर्ख बनकर उसमें सुखी होते हैं।"

उन्होंने कहा - "फिर ईश्वर को कैसे खोजा जाये?"

"खोज?"- मैंने आश्चर्य से पूछा। "खोज से आशय क्या है आपका?"

"यही कि ईश्वर दिखायी नहीं देता। वह अदृश्य है। तो कैसे उसे प्राप्त किया जाये।"-उन्होंने सफाई दिया।

मैंने कहा -"आपकी बात अभी भी अस्पष्ट है। किंतु जहाँ तक मैं समझ पा रहा हूँ आप यह मानते हैं कि वह गायब है। गुम हो गया है। उसे ढूंढना है। लेकिन आपको आश्वस्त हो जाना चाहिए कि ईश्वर गुम नहीं है। अदृश्य नहीं है, ठीक वैसे ही जैसे विज्ञान अदृश्य नहीं है। सर्वत्र विज्ञान ही भरा पड़ा है। न्यूटन को गिरते हुए सेब में विज्ञान मिला, क्लाइव बंधु को उठते गिरते केतली के ढक्कन में विज्ञान मिला, अरबी लोगों को खुले आसमान में विज्ञान मिला। यूरोपीयन को उनकी आवश्यकता ने विज्ञान सिखाया। अतः जिस प्रकार विज्ञान को जानने के लिए "वैज्ञानिक अभिरुचि" की आवश्यकता है, ठीक उसी प्रकार ईश्वर को जानने के लिए "ईश्वर में अभिरुचि" होना आवश्यक है। राजकुमार सिद्धार्थ को वटवृक्ष के नीचे खीर खाकर ज्ञान मिला, महावीर को ऋजुपालिका नदी के किनारे ज्ञान मिला, अर्जुन को समरांगण में ज्ञान हुआ, अशोक को युद्ध के बाद ज्ञान हुआ, तुलसीदास को पत्नी की डांट खाकर ज्ञान हुआ। राजा जनक को घोड़े की रकाब में पैर डालते समय ज्ञान हो गया।"

"यानि ईश्वर को जानने के लिए संयोग पर निर्भर होना पड़ेगा?" - उन्होंने मायूस होकर पूछा।

मैंने हंसते हुए कहा -" आप इतने मायूस क्यों हो रहे हैं? कौन आप अभी के अभी ईश्वर को जानने जा रहे हैं?"

उनकी तंद्रा टूटी -"फिर भी। यह जानना तो जरूरी है।"

मैंने कहा - "प्रिय मित्र! उससे पहले यह जानना जरूरी है कि क्या आप वास्तव में ईश्वर को जानना चाहते हैं यानि आपको स्वयं के बारे में जानना होगा कि आपकी आवश्यकता क्या है? क्या ईश्वर आपकी आवश्यकता है? यदि है तो फिर कभी भी कहीं भी आपको यह ज्ञान उपलब्ध हो सकता है। ठीक वैसे ही जैसे आप किसी भी चीज में विज्ञान ढूढ़ सकते हैं। लेकिन इस प्रथम महत्त्वपूर्ण बात के अलावा कुछ और बातें भी आवश्यक हैं। जैसे अच्छा गुरु, अच्छी पुस्तक, अच्छे साथी, सघन परिश्रम, सही दिशा में प्रयास आदि। किंतु ध्यान रहे यही महत्त्वपूर्ण नहीं है महत्त्वपूर्ण हैं आप और आपका प्रयास।"

"फिर मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च आदि में जाना फिजूल है?"- उन्होंने पीछे पसरते हुए कहा क्योंकि शायद वे एक लंबे उत्तर की आशा कर रहे थे।

मैंने कहा -" हो भी सकता है और नहीं भी।"

"आपका मतलब क्या है?" वे अपने आराम आसन को तोड़ते हुए आगे तरफ झुक गये।

"यही कि अगर विज्ञान की प्रयोगशाला में जाकर आपने प्रयोग नहीं किया और आप यह मान लें कि आप वैज्ञानिक हो गये, आपको विज्ञान पूरा आ गया, अब विज्ञान की आप पर कृपा हो जायेगी तो फिजूल है। लेकिन यदि आप वहाँ जाकर प्रयोग करते हैं, उससे जुड़ते हैं जो वहाँ है। और आप दिन-रात उसे सिद्ध करने में जुटे रहते हैं। तो फिर सार्थक है।"- मैं अपनी बात समाप्त ही करने वाला था कि उन्होंने फिर पूछा -" आपकी यह बात मैं पूरा समझ नहीं पाया।"

"इन स्थलों को आप ईश्वर से जुड़ने का स्थल मानिये और वे उपकरण जो वहाँ लगे हैं, रखे हैं उन्हें उस ईश्वर से जुड़ने के उपकरण। घंटा बजाकर उसकी ध्वनि को ध्यान से सुनिये। बार बार यही कीजिये आप पायेगें कि आप शांत हो रहे हैं, गहरे ध्यान में उतर रहे हैं। ईश्वर पर फूल चढ़ाते हुए उसे महसूस कीजिये कि आप वास्तव में उसे ही अर्पित कर रहे हैं। ऐसा करते हुए आप अपने आपको देखिये कि कैसे चढ़ा रहे हैं? प्रार्थना करते हुए सिर्फ शब्द मत बोलिये उन एक एक शब्द को अनुभव कीजिये। आप पायेगें कि पूरा रामायण, बाइबिल या कुरान पढ़ने की जरूरत नहीं है सिर्फ कुछ पंक्तियों में ही आप ईश्वर से जुड़ जायेगें। और अगर यह सब नहीं हो रहा है तो सच मानिये कि आप भी उस आडबंर दिखावे में सहायक बन रहे हैं।"

उन्होंने कहा -" यार! आप से बात करके खुशी हुई, लेकिन मैं तो यह भूल ही गया कि मैं ईश्वर को जानने नहीं बल्कि यह सिद्ध करने आया था कि "ईश्वर नहीं है।" हालांकि मेरी यह अवधारणा कुछ समय के लिए भले ही आगे बढ़ गयी है किंतु मुझे लगता है कि मैं एक दिन सिद्ध कर पाऊंगा "ईश्वर नहीं है।"

मैंने मुस्कराकर कहा -"प्रिय मित्र! मुझे भी आपसे बात करके खुशी हुई। मैं भी उस दिन की प्रतीक्षा करूंगा जब आप मुझे यह सूचना देगें।"

©विन्ध्येश्वरी

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