Wednesday, 17 June 2020

बंदर और टोपी की कहानी का नया संस्करण



आप सबको वह कहानी जरूर याद होगी जिसमें पेड़ के नीचे सोये हुए टोपी व्यापारी की सारी टोपियां पेड़ पर बैठे बंदर उठा ले जाते हैं। जब व्यापारी जगता है तब वह टोकरी में टोपी न पाकर दुखी होता है। बंदरों को टोपी पहने हुए देखकर उनसे टोपियां दुबारा पाने की उसे एक तरकीब सूझी। उस व्यापारी ने अपनी पहनी हुई टोपी जमीन पर फेंक दी। सभी बंदरों ने भी अपनी टोपियां जमीन पर फेंक दी। व्यापारी टोपियों को टोकरी में भरकर प्रसन्न मन से बेचने के लिये बाजार चला गया।

अब आगे की कहानी-

व्यापारी का एक आज्ञाकारी पुत्र था। पिता के कहे अनुसार वह भी टोपियों का व्यापार करने लगा। बाजार जाते समय वह आज्ञाकारी पुत्र उसी पेड़ के नीचे बैठकर विश्राम करने लगा। उसे पता न चला कि कब नींद आ गयी। इतने में उस पेड़ पर बैठे सारे बंदर उसकी टोकरी से सारी टोपियां उठा ले गये। और लगाकर मजे लेकर एक दूसरे की शक्लें निहारने लगे।

जब उस व्यापारी की नींद खुली तब वह टोकरी में टोपियां न पा कर दुखी हुआ। तब तक उसे याद कि पिता जी ने अपना एक किस्सा सुनाया था। उसमें भी बंदरों ने उनकी टोपी ले ली थी। फिर उन्होंने अपनी पहनी हुई टोपी को जमीन पर फेंक दिया। सारे बंदरों ने भी वैसा ही किया था। इस आज्ञाकारी बेटे ने भी अपनी पहनी हुई टोपी को जमीन पर फेंक दिया और बंदरों द्वारा टोपियां फेंके जाने का इंतजार करने लगा।

लेकिन यह क्या? एक बंदर जिसके सिर पर टोपी नहीं थी वह पेड़ से उतरा, उसने जमीन पड़ी हुई उस टोपी को उठाया और पहनकर पेड़ पर जाकर बैठ गया। आज्ञाकारी व्यापारी बहुत दुखी हुआ। उसके पिता की बतायी हुई तरकीब काम नहीं आयी।

कहानी का निष्कर्ष

हमारे साथ सदियों से ऐसा ही होता आया है। हमारे बाप - दादा जो किये हैं वही करने की हमें शिक्षा दी जाती है। वही करने के लिये हमें बाध्य किया जाता है। और ऐसा न कर पाने पर हमारे ऊपर नालायक और अवज्ञाकारी का तमगा लगा दिया जाता है। धर्म के क्षेत्र में पंडे- पुरोहितों, मुल्ला - मौलवियों, पादरियों - भिक्षुओं और जैन साधुओं ने ऐसा ही किया है। हमारे सामने एक लकीर खींच दी गयी है और बार बार कहा जाता है - यह वही लकीर जिससे तुम्हारी किस्मत लिखी गयी है और बनेगी भी इसी से। इससे आगे सोचना पाप है।

जब भी कोई बच्चा या युवक अपने किसी बुजुर्ग से कोई अटपटा प्रश्न करता है, पहले तो नासमझ मानकर टाला जाता है, बाद में उसे शालीनता और सभ्यता का पाठ पढ़ाया जाता है। प्रश्न इस समाज को व्यथित करता है। बेचैन करता है। बंधी - बंधाई धारणाओं, मान्यताओं, विश्वासों पर चलना जितना आसान है उतना नये मार्ग को खोज कर या निर्माण करके चलना नहीं। हमें उसी मार्ग पर चलने की शिक्षा दी जाती है जो जीर्ण-शीर्ण और पुरानी हो चुकी है। जो कालबाह्य (आउटडेटेड) हो चुकी है भले ही उसकी दिशा उधर न जाती हो जिधर हमें वास्तव में जाना है।

हमें मूर्ख आज्ञाकारी पुत्र बनना है या एक विवेकशील मनुष्य? मेरा स्पष्ट मत है कि आज्ञाकारी व्यापारी पुत्र बनकर गलत मार्ग पर जाने से ज्यादा श्रेष्ठ है अवज्ञाकारी बनकर नये मार्ग की खोज करना। क्योंकि टोपी को उतार कर फेंकना उसके पिता के समय का सच था। अब समय बदल चुका है। नये रास्ते, नये तरीके, नये विचार खोजना होगा अगर हम अपनी समूल पूंजी को खोना - गंवाना नहीं चाहते हैं तो……….

©विन्ध्येश्वरी

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