Sunday, 20 July 2025
धर्म क्यों जरूरी है?
धर्म क्यों जरूरी है?
पहले ससुराल वाले मिलकर पत्नी/बहू/भाभी आदि को जला देते थे, मार डालते थे। यह लालच और लोभ की लड़ाई थी। इस कहानी में प्रायः पति निर्दोष ही होता था। बेचारा होता था। असली खलनायक प्रायः सास, ननद या कभी-कभी ससुर और जेठ हुआ करते थे। कहावत चलती थी कि स्त्री ही स्त्री की शत्रु है। समय बदला किस्सा बदला।
आजकल खबरों में पति-पत्नी के मध्य द्वंद्व के कई सारे किस्से हैं। एक में पत्नी पति को काटकर नीले ड्रम में भर देती है और सीमेंट से ढक देती है। एक कहानी में पत्नी हनीमून पर जाकर अपने प्रेमी संग मिलकर पति को मार देती है। एक कहानी में लगभग 10 साल पुराने संबंध को एक पत्नी श्रद्धांजलि दे देती है।
एक कहानी मेरे मित्र की है। पत्नी उससे विवाह ही इसलिए करती है ताकि बाद में उसे दहेज आदि के मामले में फंसाया जा सके। एक कहानी मेरे एक और मित्र की है। उसमें पिता और बेटियों का काम ही यही है कि विवाह करके पति को फंसाओ और फिर पैसा बनाओ।
कुछ कहानी मेरे भुक्तभोगी मित्र ने सुनाया। उनकी एक कहानी में पत्नी विवाह के बाद अपने प्रेमी संग जाने की जिद करती है। सब राजी भी हो जाते हैं। लेकिन प्रेमी अपनाने से मना कर देता है। पत्नी फिर पति के पास जाना चाहती है लेकिन इस बार पति मना कर देता है।
उन्होंने ही एक कहानी और बताया। शादी हल्दी से पहले ही टूट जाती है। कारण वही प्रेमी-प्रेमिका।
ऐसे सैकड़ों नहीं लाखों-करोड़ों किस्से होंगे। कुछ जगजाहिर कुछ अभी भी दबे हुए।
क्या हो गया है आजकल लोगों? यही प्रश्न होगा न? नहीं अतीत में भी ऐसी कहानियां घटित हुई होंगी। यह कोई नई कहानियां नहीं हैं। लेकिन इन कहानियों को पाप की दृष्टि से देखा जाता रहा है। इसे धर्म का लोप माना जाता है।
धर्म क्यों? धर्म का कार्य है लोगों को जीवन दृष्टि प्रदान करना, जीवन जीने का सही मार्ग दिखाना, सिखाना। इसे भगवान व धार्मिक कथाओं के माध्यम से लोगों के मध्य स्थापित किया गया है। भगवान और नरक का भय लोगों को अनीति, अनाचार, पापाचार करने से रोकता है। सदवृत्ति पर जोर देने का तात्पर्य यह है कि लोग ईश्वर को डर के कारण नहीं प्रेम के कारण भजें। पुराण, महाभारत, रामायण आदि में कहानियों के माध्यम से लोगों को धर्म और नीति का प्रयोगात्मक पहलू समझाया गया है। यह ग्रंथ धर्म और नीति के केस स्टडी हैं। इन्हें पढ़ने से जीवन दृष्टि मिलती है।
लेकिन आज तो आदमी तरक्की कर गया। उसे पता चल गया कि चंद्रमा एक देवता नहीं है, बल्कि पृथ्वी के इर्द-गिर्द घूमता हुआ उपग्रह है। उसे पता चल गया है कि धरती माँ नहीं एक ग्रह है। उसे पता चल गया है कि यह ब्रह्माण्ड किसी शेषनाग ने नहीं बल्कि गुरुत्वाकर्षण ने धारण किया है। आज आदमी पक्षियों से तेज उड़ सकता है, मछली से तेज तैर सकता है, घोड़े से तेज दौड़ सकता है। आज आदमी स्वयं आकाशवाणी कर सकता है। आज दो दिन पहले मौसम की झूठी-सच्ची भविष्यवाणियां हो सकती हैं। आज हम मोबाइल हाथ में लेकर दुनिया को मुट्ठी में कर सकते हैं। आज हम चैट जीपीटी, ए आई तकनीक आदि के कारण झूठ को सच व सच को झूठ में बदल सकते हैं। हमारे खाने-पीने का तरीका, सलीका, जायका सब आधुनिक हो गया है। आज हम वर्षों का काम घंटों या मिनटों में कर लेते हैं। मनोजवं मारुततुल्य वेगं, बुद्धिमतां वरिष्ठं हो गये हैं।
इतनी तरक्की, इतना उत्थान, इतना विकास, इतना धन, ऐसे में धर्म का क्या काम? भगवान का क्या काम? धार्मिक कथाओं का क्या काम? इसे कहने-सुनने वाले पोंगापंथी, ढोंगी, ब्राह्मणों, पंडितों का क्या काम? और यह भी तो उसी भौतिकतावाद और आधुनिकीकरण के वशीभूत हो गये हैं। इनका भी तो प्रभाव क्षीण से क्षीणतम हो रहा है।
तो याद रखना, अभी तो कहानी शुरू भी नहीं हुई है। आरंभ है प्रचंड है। अभी आगाज है तेरा अभी अंजाम बाकी है। यदि समाज से ईश्वर, धर्म, नीति, सदाचार का लोप होगा तो अभी इतना सामाजिक, पारिवारिक, राजनीतिक, धार्मिक, नैतिक आर्थिक, विघटन, अनाचार, कदाचार, भ्रष्टाचार, पतन देखना पड़ेगा कि रूह कांप जायेगी। अभी इससे भी जघन्यतम और वीभत्स दौर देखना बाकी है। और याद रखना इसे कोई विज्ञान, कोई संविधान, कोई कानून, कोई सरकार, कोई प्रशासन, कोई सत्ता नहीं रोक सकती, सिवाय धर्म और बिजूका (हमारे यहाँ इसे वूढ़ कहते हैं) ईश्वर के।
समाज, परिवार, देश, संबंध, प्रेम को बांधे रखने के लिए जिंदा रखने के लिए अधिकार बोध नहीं कर्त्तव्य बोध जरूरी है। नैतिकता और सदाचार जरूरी है। और यह बात कोई विज्ञान, कोई संविधान, कोई कानून नहीं सिखा सकता। कोई आर्थिक, वैज्ञानिक तरक्की इसे नहीं मुहैया करा सकती। इसे सिर्फ धर्म और अज्ञात ईश्वर के नाम से उपलब्ध कराया जा सकता है।
Saturday, 5 July 2025
असली यदुवंशी
वाह क्या भागवत कथा है? श्री कृष्ण भगवान ने इन्हीं यदुवंशी (?) राक्षसों के महिमामंडन हेतु यदुकुल में अवतार लिया था? जिस यदुकुल का वर्णन सुनकर मोक्ष प्राप्त हो जाता है?
लेकिन रुको जरा……
आपको बता दें कि संभवतः कोई वास्तविक यदुवंशी बचा ही नहीं है (दावे से नहीं कह सकता लेकिन 99.99 प्रतिशत संभावना यही है)। श्रीमद्भागवत जी में कथा आती है कि मथुरा पर बार बार जरासंध के आक्रमण से त्रस्त होकर यदुवंशियों को बचाने के लिये श्रीकृष्ण ने विश्वकर्मा जी द्वारा चारों तरफ से समुद्र से सुरक्षित द्वारिका नगरी का निर्माण करवाया। फिर सारे यदुवंशियों को ले जाकर वहीं बसाया।
श्रीकृष्ण जी के रहते ही धीरे-धीरे सारे यदुवंशी इतने मदमत्त, उपद्रवी, अधर्मी और आततायी हो गये थे कि श्री कृष्ण चिंतित हो गये। उन्होंने विचार किया कि जिस धर्म की स्थापना करने के लिये उन्होंने अवतार लिया, जन्म से लेकर आज तक असुरों, राक्षसों का नाश किया, महाभारत करवाया, उसे तो उनके ही वंशज नष्ट कर रहे हैं। फिर उन्होंने अपनी माया प्रेरित कर महर्षि दुर्वासा द्वारा यदुवंशियों को शाप दिलाकर, (गांधारी का भी शाप इसमें जुड़ता है - जिस प्रकार तुमने मेरे कुल का नाश करवाया है उसी प्रकार तुम्हारे भी कुल का नाश होगा)। तो प्रभास क्षेत्र में ले जाकर सभी यदुवंशियों को आपस में लड़ाकर मरवा दिया है। स्त्रियों को श्रीकृष्ण ने अर्जुन के साथ भेज दिया था। जिसे भीलों ने लूट लिया। अर्थात कुल मिलाकर श्रीकृष्ण के कुल में किसी सदस्य के बचने की संभावना नगण्य है।
अब अगर यदुवंशी यादवों का नाश हो गया, यहाँ तक कि कृष्ण भी बहेलिया द्वारा मारे गये। उनकी स्त्रियों को भीलों ने लूट लिया तो आज के यदुवंशी कौन हैं?
संभावना यह है कि गोकुल, वृंदावन क्षेत्र के ग्वाल, ढंढोर, अहिर आदि ही आज के यदुवंशी बन गये हैं जो कि कृष्ण के वंशज नहीं हैं। (मूलतः तो श्रीकृष्ण का जन्म यदुवंशी क्षत्रिय वासुदेव जी के यहाँ हुआ था, नन्द जी वासुदेव जी के मित्र थे, ग्वाल थे। वहाँ श्रीकृष्ण जी का पालन-पोषण हुआ, जन्म नहीं)
तो श्रीकृष्ण भगवान के नाम पर उछलने वालों सबसे पहले अपना इतिहास पता कर लो, अपना कुल गोत्र पता कर लो फिर यह कहो कि आप यदुवंशी हो। या फिर कुछ और
सादर नमन
डॉ.विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी
Thursday, 3 July 2025
ब्राह्मण से परमेश्वर हारो - क्या सच में?
एक बहु प्रचलित छंद है ब्राह्मणों की प्रतिष्ठा में।
ब्राह्मण पैर पताल छलो, औ
ब्राह्मण ही साठ हजार को जारो।
ब्राह्मण सोख समुद्र लियो औ
ब्राह्मण ही यदुवंश उजारो॥
ब्राह्मण लात हनी हरि के तन
ब्राह्मण ही क्षत्रिय दल मारो।
ब्राह्मण से जिन बैर करो,
ब्राह्मण से परमेश्वर हारो॥
और इसे कहकर लोग दंभ भरते हैं कि ब्राह्मण से पंगा मत लेना ब्राह्मण बहुत खतरनाक जीव है। ब्राह्मण से भगवान भी हार गये।
कड़वी बात कह रहा हूँ लेकिन सोचना जरूर। मेरी पंक्तियों को ध्यान रखकर अपना मुंह दर्पण में जरूर देखना एकबार।
किस ब्राह्मण ने राजा बलि को छला था? किस ब्राह्मण ने राजा सगर के 60 हजार पुत्रों को भस्म किया था? किस ब्राह्मण ने समुद्र को सोख लिया था? किस ब्राह्मण ने यदुवंश के विनाश का शाप दिया था? किस ब्राह्मण ने विष्णु की छाती पर लात मारा था? किस ब्राह्मण ने क्षत्रियों का संहार किया था? कौन थे वे?
शिखा, सूत्र, तिलक, संध्या, गायत्री उपासना हीन ब्राह्मण? भक्ष्याभक्ष्य का विवेक न रखने वाले ब्राह्मण? शौच-अशौच का पालन न करने वाले ब्राह्मण? मांस-मदिरा का सेवन करने वाले ब्राह्मण? कुलाचार, तपश्चर्या से हीन ब्राह्मण? वेद, शास्त्र पारायण हीन ब्राह्मण? चिंदी-चिंदी सिक्कों के लिये भगवान और शास्त्र का सौदा करने वाले ब्राह्मण? पोथी-पत्तरा कांख में दबा सीधा उगाहने वाले ब्राह्मण? चंद से लाभ के लिये दुम हिलाने वाले, जी हजूरी करने वाले ब्राह्मण?
नहीं। वे थे महर्षि कपिल। वे थे महर्षि अगस्त्य। वे थे महर्षि दुर्वासा। वे थे महर्षि भृगु। वे थे भगवान परशुराम। और इनसे आप अपनी तुलना करते हैं? लज्जा नहीं आती अपने आपको इन महर्षियों के समक्ष रखते समय? आप इनके हजारवें अंश के एकांश भी हैं? भूल कर भी इनके बरक्स कभी स्वयं को खड़ा मत करना। आपकी क्षमता नहीं है इनसे तुलना की। आप हिमालय के समक्ष चींटी को खड़ा कर रहे हैं।
इन्होंने अपना पूरा जीवन तपश्चर्या को समर्पित कर दिया था। इनके जीवन में अगर कुछ था तो तप, तप और तप। इन्होंने तप बल से बलि को छला, सगर पुत्रों को अधर्म का दंड दिया, तपबल से समुद्र पान किया। यदुवंशियों की उद्दंडता का दंड तपबल से दिया। तपबल था महर्षि भृगु जी के पास कि वे विष्णु लोक जाते थे अबाध, बेरोक-टोक, जहाँ देवता का भी प्रवेश निषेध था। परशुराम जी स्वयं भगवान के आवेशावतार थे। और आप? आपने कौन सा तप किया है जो इनसे अपनी तुलना करते हैं?
सादर नमन 🙏🙏🙏
डॉ.विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी
Wednesday, 2 July 2025
शास्त्रानुसार अग्राह्य, पतित ब्राह्मण
शास्त्रानुसार अग्राह्य ब्राह्मण, पतित ब्राह्मण
इस समय लोग ब्राह्मण की पूजनीयता के संदर्भ में शास्त्रों से विविध प्रमाण दे रहे हैं। ध्यान रहे शास्त्र एकांगी निर्णय नहीं देते। जिन शास्त्रों में ब्राह्मणों की पूजनीयता का वर्णन है उन्हीं शास्त्रों ने इन्हें ब्राह्मणत्व के पालन का भी निर्देश किया है। ब्राह्मणत्व की कसौटी बताया है। तब क्यों भूल जाते हैं शास्त्र को?
धर्मग्रंथों में ब्राह्मण का स्वरूप न केवल जन्म से, अपितु आचरण, ज्ञान, तप, शुचिता और वेदाध्ययन से निर्धारित किया गया है। यदि कोई ब्राह्मण शास्त्रीय नियमों की अवहेलना करता है, तो उसे धार्मिक कार्यों से वर्जित भी घोषित किया गया है, यहाँ तक कि कुछ विशेष स्थितियों में उसे 'चाण्डाल' के समान भी कहा गया है।
"शिखाहीनं द्विजं विद्धि मन्त्रहीनं च पार्थिव।
यज्ञोपवीतहीनं च तं मुन्याः चाण्डालसंज्ञितम्॥"
(स्कन्दपुराण, वैष्णवखण्ड, 5.3.45)
स्कन्दपुराण के अनुसार यदि ब्राह्मण शिखा, यज्ञोपवीत और तिलक धारण नहीं करता तो वह चाण्डालतुल्य होता है।
"वेदवर्जितशौचाभ्यां पतितः स्यात् द्विजः खलु।
न स धर्मेऽधिकारी स्यात् यज्ञादौ न च तर्पणे॥"
(याज्ञवल्क्य स्मृति 1.158)
याज्ञवल्क्य स्मृति में कहा गया है कि जो ब्राह्मण वेद, शौच, और आचार से भ्रष्ट हो गया हो, वह धर्मकार्य का अधिकारी नहीं होता।
"शौचवर्जितं आचारहीनं वेदवर्जितं द्विजम्।
चाण्डालतुल्यमेवं स्यात् यज्ञदानविवर्जितम्॥"
(गौतम धर्मसूत्र 12.4)
गौतम धर्मसूत्र में वर्णन है कि जो ब्राह्मण शास्त्रीय विधियों का त्याग करता है और शुचिता से रहित होता है, वह चाण्डाल के समान समझा जाता है।
वेदबहिष्कृतं विप्रं मन्त्रहीनं शुचिं शुचिम्।
शूद्रादधममिच्छन्ति क्रियतश्चानपात्रकः॥
जो ब्राह्मण वेदपाठ से रहित है, वह चाहे शुचि (पवित्र) दिखता हो, परंतु वह शूद्र से भी अधम है और दान आदि के लिए अपात्र माना गया है।
शिखी सूत्री च यस्त्वेति तिलकं ललाटके स्थितम्।
न तं दृष्ट्वा हविर्ग्राह्यं ब्राह्मणोऽपि च चाण्डालवत्॥
(ब्रह्मवैवर्त पुराण, श्रीकृष्णजन्म खंड, अध्याय 62, श्लोक 28)
जो ब्राह्मण शिखा, यज्ञोपवीत और ललाट पर तिलक धारण नहीं करता, उसे देखकर भी यज्ञ में आहुति ग्रहण नहीं करनी चाहिए; वह ब्राह्मण भी चाण्डाल के समान है।
ब्राह्मणो वेदहीनो यो नास्तिको लौकिको नरः।
स एव द्रव्यदानेषु यजनेषु च वर्जितः॥
(महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 142, श्लोक 35)
जो ब्राह्मण वेदविहीन, नास्तिक और केवल लौकिक दृष्टिकोण वाला है, वह दान और यज्ञादि धार्मिक कार्यों में वर्जित है।
शाठ्यं मायां च दम्भं च केवलं याचकं तथा।
निष्ठुरं नास्तिकं तीर्थं हन्तारं वर्जयेद्विपम्॥
(मनुस्मृति 4.80)
जो ब्राह्मण कपटी, मायावी, ढोंगी, केवल याचना करने वाला, कठोर, नास्तिक, पवित्रता का अपमान करने वाला और हिंसक हो, ऐसे ब्राह्मण को वर्जित करना चाहिए।
न स्नायाद्यो न जपते न हुतं यो न वेदपाठः।
स ब्राह्मणोऽप्यधो गम्यः स चाण्डाल समो मतः॥
(कात्यायन स्मृति)
जो ब्राह्मण न स्नान करता है, न जप, न हवन करता है, न वेद का स्वाध्याय करता है, वह ब्राह्मण होते हुए भी अधम गति को प्राप्त होता है और चाण्डाल के समान माना गया है।
सुरापानं च गम्भीरं ब्राह्मणस्य विशेषतः।
न देयं भोज्यं च तस्मै द्रव्यं चोक्तं च किञ्चन॥
(मनुस्मृति 11.60)
जो ब्राह्मण मद्यपान करता है, उसे कोई भी दान, अन्न या धन नहीं देना चाहिए। वह विशेष रूप से पतित माना गया है।
(महाभारत, शांति पर्व):
जातिमात्रेण यो गर्वं कुरुते ब्राह्मणो द्विजः।
न स विप्रः सुदुर्धर्षः पतितो जातिभाज्यतः॥
जो ब्राह्मण केवल जाति के आधार पर गर्व करता है, वह ब्राह्मण नहीं, बल्कि जाति के कारण पतित है।
सारांश यह है कि यज्ञ, हवन एवं अग्निहोत्र — वेदहीन व अशुद्ध ब्राह्मण को यज्ञ में आहुति देना वर्जित है।
दान देना या लेना — पतित ब्राह्मण को दान देना निषिद्ध है।
श्राद्ध कार्य — शास्त्रों में कहा गया है कि यदि पतित ब्राह्मण को पिण्ड या तर्पण दिया जाए, तो पितरों को हानि होती है।
पूजा-पाठ कराना — ऐसे ब्राह्मण द्वारा की गई पूजा स्वीकार्य नहीं होती।
अस्तु यदि किसी ब्राह्मण के पास शिखा, सूत्र, संध्या, गायत्री का जप, पुरश्चरण, पंचबलि, भगवती की उपासना/साधना, कुलाचार अनुसार कुलदेवी/देवता की पूजा, गुरु दीक्षा, शौच-अशौच का विवेक, संयम, शील, संतोष, तपश्चर्या नहीं है तो मुझे आपके ब्राह्मण नामधारी होने में कोई दिलचस्पी नहीं है। मेरी दृष्टि में आपमें और एक शूद्र में विशेष अंतर नहीं है। सिवाय एक अंतर के कि आपके पास अभी भी अपने मूल में वापस आने का विकल्प है। और ध्यान रहे मुझे यह कहने के लिये शंकराचार्य होने की आवश्यकता नहीं है, शास्त्रों का अध्ययन ही पर्याप्त है।
सादर नमन
Monday, 30 June 2025
धर्म एक धंधा है
भगवान शिव की कृपा से आज मैं अकबरपुर के निकटस्थ पवित्र, प्रसिद्ध, सिद्ध धार्मिक स्थल शिव बाबा के स्थान पर गया था। शिव बाबा का धाम मेरे ख्याल से कोई सौ सवा सौ हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फैला हुआ। हर तरफ आदमी थे। जिस समय (सुबह 10.30 बजे) मैं गया था, उस समय लगभग चार-पांच हजार की भीड़ तो रही होगी। अगर गणना करूं तो सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक तकरीबन 50 हजार लोग दर्शन पूजन करेंगे ही। यह आज के सोमवार की बात है हर सोमवार यही होता होगा। आम दिनों में भी चार-छः हजार लोग आ ही जाते होंगे। श्रद्धा, भक्ति, आस्था, विश्वास अपनी जगह है। आज मैं बात करूंगा धर्म के धंधे की।
हर तरफ दूकानें सजी हैं - फूल-माला, पूजन सामग्री, मूर्ति-चित्र-डमरू-त्रिशूल, मिठाई, जलेबी, लइया, रेवड़ी, झाल-पूड़ी, नमकीन, मूंगफली, रामदाना, चिक्की, खिलौना, चाट-फुलकी-टिक्की, समोसा-पकौड़ा-चाय, चाउमीन-बर्गर, कपड़ा, बर्तन, शृंगार, हंसिया-खुरपी-चाकू-छूरी, गन्ने का रस, कुल्फी-आइसक्रीम, कोल्ड-ड्रिंक, घोड़ा-झूला, चकरी-झूला, स्लाइडर, छुकछुक रेल, जम्पर, नाई, पार्किंग वाले, चंदन लगाने वाले, रक्षासूत्र बांधने वाले, कथा बांचने वाले (पंडित), फोटो खींचने वाले, गोदना गोदने वाले, रिक्शा वाले आदि। मुख्य प्रवेशद्वार वाले मार्ग के एक ओर की पटरी पर लगी दूकानों को मैंने गिना कुल 36 दूकानें लगीं थीं। दूसरी पटरी पर भी कमोबेश 30 दुकानें तो रहीं ही होगी।
इस तरह की 20 गलियां बनी हैं जहाँ दूकानें लगी थीं। हर गली में औसतन मैं 30 दूकान भी मान लूं तो करीब 600 दूकानें लगी होगीं। 600 दूकान बराबर 600 परिवार। हर परिवार से यदि 2 व्यक्ति भी वहाँ लगे हों तो 1200 लोगों को रोजगार मिला हुआ है। अकेले मैंने ही कुल 9 दूकानों से 720 रूपये की खरीददारी किया।
मैं यह मानकर चलता हूँ कि हर व्यक्ति न अधिक पांच सौ रूपये खर्च करें। और सभी न खर्च करें केवल दो हजार लोग ही खर्च करें तो पांच सौ के हिसाब उस दो घंटे में 10 लाख की खरीदारी हुई होगी। एक घंटे के लिहाज से 5 लाख। यदि शिव बाबा का धाम केवल 12 घंटे ही खुला रहे तो पूरे दिन में 60 लाख का धंधा होगा। हर दूकान पर न्यूनतम 5 हजार का व्यापार होगा। जिसमें से हजार-बारह सौ मुनाफा तो बनेगा ही। यह न्यूनतम अनुमान है।
इतनी गणना करने और इतना बोर करने के पीछे मेरा एक उद्देश्य है कि धर्म धंधा तो है। इतना अच्छा धंधा कि एक क्षेत्र के करीब बारह सौ लोगों को रोजगार मिला हुआ। और आपको जानकर आश्चर्य होगा कि उद्योग में संलग्न कर्मचारियों की संख्या के आधार (सूक्ष्म उद्योग 1-9, लघु उद्योग 10-49, मध्यम उद्योग 50-249, बृहद उद्योग 250 से अधिक) यह शिव बाबा का धाम बृहद उद्योग से अधिक लोगों को रोजगार उपलब्ध करा रहा है। और आश्चर्य की बात यह कि न्यूनतम निवेश में। शिव बाबा के रूप में एक पीपल का पेड़ है। उसी के इर्द-गिर्द यह सारा धंधा फैला हुआ है। है किसी व्यवस्था में दम जो एक पेड़ के सहारे एक दिन में न्यूनतम 60 लाख का धंधा करके दिखा दे?
दूसरा आश्चर्य यह है कि यहाँ केवल ब्राह्मणों की दुकानें नहीं हैं बल्कि हर जाति बिरादरी की दुकानें हैं। मैंने मिठाई यादव दूकान की से, नारियल, फूल, माला, अगरबत्ती की डलिया वर्मा की दुकान से, माला-फूल की छोटी डलिया सैनी की दूकान से, लइया, पेठा, चिक्की प्रजापति की दूकान से, डमरू, माला और कटोरी ब्रिजेश नामक व्यक्ति के यहाँ से खरीदा। गन्ने का रस पिया था अमन हरिजन के यहाँ, झूला और स्लाइडर वाले भी हरिजन थे। बेलन और एक खिलौना लिया अग्रवाल के यहाँ से। तो जातीय समीकरण के हिसाब से भी लगभग सभी जातियों की भागीदारी रही होगी। नजरी तौर पर मेरा अनुमान है कि 8-10 पंडित जी कथा का सेटअप बनाकर रखे थे कुछ लोग खाली बैठे थे कुछ के यहाँ 2-4 लोग बैठकर कथा सुन रहे थे। 4-5 लोग चंदन लगाने का का भी कम कर रहे थे।
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि धर्म (यहाँ धर्म का वही अर्थ ग्राह्य है जो लोग समझते हैं मेरी दृष्टि में यह धर्म नहीं, कर्मकांड है धर्म का आभास है) एक धंधा है लेकिन जैसाकि मूढ़ लोग कहते हैं वैसा नहीं। यह सतत, संधृत, सम्यक धंधा है। न किसी को कोई नुकसान न ज्यादा मुनाफा। सबकी रोजी रोटी चलती रहे। हाँ बेशक यहाँ से कुछ उत्पादन नहीं हो रहा है लेकिन इस बाजार के भरोसे कितनी फैक्टारियां खड़ी होंगी, अंदाजा भी है किसी वामी, कामी, मतिभ्रष्ट पथभ्रष्ट हिन्दू को?
याद रखना भारतीय चिन्तन का जोर मुनाफा कमाने पर नहीं है सबकी आजीविका चलते रहने पर है वह भी बिना किसी बाधा, अवरोध, प्रतिरोध, प्रतिस्पर्धा के, बिना किसी तनाव-दबाव-दुराव के, बिना किसी विद्वेष-ईर्ष्या के। हमारा उद्देश्य मोटा माल बनाना नहीं प्रेम, शांति, सौहार्द्य, समरसता, बंधुत्व बनाये रखना था, समाज और देश को एकजुट रखना था। संसार की कोई भी व्यवस्था ले आइये वह उपर्युक्त बातों के साथ ही हर हाथ को काम, हर मुंह को निवाला और हर व्यक्ति को उसकी न्यूनतम आवश्यकता पूर्ति का साधन नहीं दे सकती। कोई कितना भी विकसित देश क्यों क्यों न हो कुछ न कुछ बेरोजगारी वहाँ होती ही है (जैसे- अमेरिका 4.2%, चीन 5.1% भारत 4.9 %, जापान 2.5%, जर्मनी 6.3%, यूनाइटेड किंगडम 4.5%, फ़्रांस 7.3%, ब्राजील 7.2% आदि)। लेकिन हमारी व्यवस्था ने यह कर दिखाया था जिसे लूट के चक्कर में मुस्लिम तथा ब्रिटिश काल में नष्ट-भ्रष्ट कर दिया गया और स्वतंत्र भारत में तो उसकी चूलें तक हिला दी गयीं। हाँ इस व्यवस्था के दोष भी बहुत हैं।
दोष यह है कि हमारी भौतिक प्रगति बाधित हो जाती है, हम कोई मल्टीनेशनल कम्पनी नहीं खड़ा कर सकते, हम बिलगेट्स, वारेन बफेट, जेफ़ बेजोस, मार्क जुकरबर्ग, कोलम्बस, वास्कोडीगामा, राबर्ट क्लाइब नहीं पैदा कर सकते। हम विश्व को उपनिवेशवाद के चंगुल में नहीं जकड़ सकते। हम विश्व के संसाधनों को लूटने के लिए नये-नये तरीके नहीं ढूढ़ सकते। अफ्रीकी देशों, दक्षिण अमेरिकी देशों, भारत सहित तमाम दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों, आस्ट्रेलिया आदि को रौंद नहीं सकते। वहाँ के मूलनिवासियों का सफाया नहीं कर सकते। रबर का कोटा न पूरा होने पर हम बेल्जियम की तरह कांगो में नरसंहार तथा लोगों के हाथ नहीं काट सकते। स्पेनियों की तरह अजटेक, माया और इंका लोगों का समूल नाश नहीं कर सकते। अफ्रीकी गुलामों को लैटिन अमेरिका में बेंच नहीं सकते। हम तेल के लिए ईरान, इराक, यमन आदि पर झूठा युद्ध नहीं थोप सकते। हम विश्व को नव उपनिवेशवाद में नहीं जकड़ सकते।
चूँकि मुनाफा कमाने पर हमारा बहुत जोर नहीं है, जीवन चल ही रहा है, शांति है संतोष है, तो नवाचार, खोज, आविष्कार नहीं होगा, तकनीकी क्रांति, मोबाईल क्रांति, ए आई क्रांति नहीं होगा। धरती का सीना चीरकर खनिज नहीं निकाला जायेगा, पेड़ नहीं कटेगा, पहाड़ नहीं टूटेगा, हवा, पानी, नदियाँ, भूमि नहीं दूषित होंगी। वैश्विक तापन, जलवायु परिवर्तन नहीं होगा। सामाजिक प्रदूषण, वैचारिक प्रदूषण, पारिवारिक प्रदूषण नहीं होगा। समाज देश जैसा चल रहा था वैसा ही सहस्राबदियों तक चलता रहेगा, अपनी धुन में मस्त।
Saturday, 28 June 2025
क्या कथावाचन, पूजा-पाठ करवाना ब्राह्मणों का दायित्व है?
क्या कथावाचन, पूजा-पाठ करवाना ब्राह्मणों का दायित्व है?
हम अपने आसपास देखते हैं कि कई सारे ब्राह्मण सत्यनारायण व्रत कथा, श्रीमद्भागवत कथा, रामायण कथा, पूजा-पाठ भी आदि करते करवाते हैं। अब प्रश्न यह है कि क्या यह ब्राह्मणों का कार्य है?
इसके पहले कि मैं इस बात का उत्तर दूँ, एक जिज्ञासा है कि क्या भगवान परशुराम, इनके पिता महर्षि जमदग्नि, इनके पिता महर्षि भृगु, महर्षि जाबालि, महर्षि वसिष्ठ, महर्षि भारद्वाज, महर्षि याज्ञवल्क्य, महर्षि अत्रि, महर्षि अगस्त्य, महर्षि दुर्वासा, महर्षि असित, महर्षि देवल, महर्षि कश्यप, महर्षि कणाद, महर्षि पतंजलि, महर्षि सांदीपनि, महर्षि गर्ग, भगवान कपिल, ऋषि गालव, ऋषि उद्दालक, ऋषि शांडिल्य, ऋषि गौतम, ऋषि च्यवन आदि ने किसी के यहाँ कथावाचन किया, यजमानी किया, पूजा-पाठ करवाया? जैसाकि शास्त्रों के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि इनका मुख्य काम तपस्या, शक्ति की उपासना-साधना, शास्त्र का अध्ययन करना, यज्ञ करना व करवाना आदि था। इन्होंने आजन्म यही किया। कभी-कभी किसी के विशेष आग्रह पर इन्होंने पूजा-पाठ, करवाया होगा। उसमें भी यज्ञ को वरीयता देते थे।
हाँ, महर्षि वशिष्ठ, देवगुरु बृहस्पति, महर्षि सांदीपनि, महर्षि गर्ग आदि ने देवताओं तथा भगवान राम व भगवान कृष्ण के कुल में उनके दर्शनार्थ उनका कुलगुरु व कुलपुरोहित होना स्वीकार किया। उन्होंने भगवान से नीचे कुछ भी स्वीकार नहीं किया। और हम आज के ब्राह्मण क्या कर रहे हैं? एक झोले में पोथीपत्तरा रखकर घर-घर सीधा उगाह रहे हैं? शालिग्राम पर अक्षत-फूल-फल-दक्षिणा चढ़वा रहे हैं? रामायण गाते फिर रहे हैं? मारे-मारे फिर रहे हैं?
दूसरी बात ब्राह्मणों का कर्तव्य स्वयं वेदाध्ययन करना, सुयोग्य पात्र शिष्य को वेदाध्ययन, शास्त्राध्ययन करवाना, यज्ञ करना व करवाना, दान लेना व देना है। इन सबसे ऊपर उनका मूल कर्तव्य तपस्या है, शक्तियों की उपासना-साधना करना है। न भागवत या रामायण या सत्यनारायण कथा एक कथा करना है। यह कब से धर्म हो गया? यह कब से ब्राह्मण का कर्म हो गया? व्यास जी ने पुराणों का सृजन इसलिये किया था कि जिन्हें वेदाध्ययन का अधिकार नहीं है वे भी भगवत प्रीत्यर्थ कार्य कर सकें, वे भी भगवत भक्ति कर सकें।
यह ब्राह्मणों का दुर्भाग्य है, उनकी असफलता है कि उन्हें अपने कर्तव्यों को छोड़कर नाचनौटंकी करना शुरु कर दिया। चंद सिक्कों के लिये शक्ति की उपासना छोड़कर सत्यनारायण कथा, भागवत कथा कहना शुरु कर दिया। "गंगधाम को छोड़कर दुरमति कूप खनवा रहा है।"
यह सब हुआ। तो कुछ कारण हैं -
1- हर ब्राह्मण तपस्या नहीं कर सकता था। उसकी क्षमता नहीं रही उतनी। तो उसने अपने मूल कर्म को छोड़कर नौटंकी-नाच करना शुरू कर दिया। यह ब्राह्मणत्व की असफलता है।
2- समय बदला चीजें बदलीं। मनुष्यों की आवश्यकताएं बदलीं। ब्राह्मणों की भी। उन्होंने उन चीजों को भी समाज में प्रतिष्ठित करना शुरु कर दिया जो चीजें गौण हुआ करती थीं। नतीजा दुर्दिन तो होगा ही।
3- पहले लोग इतने सुशिक्षित होते थे कि वे अपना पूजा-पाठ स्वयं कर सकें। लेकिन धीरे-धीरे उनके जीवन में आपाधापी, भौतिकता का समावेश इतना जबर्दस्त हुआ कि वे सब इसे छोड़ते गये। लेकिन संस्कार मन में वही था कि पूजा-पाठ करना है तो फिर ब्राह्मणों को ढूंढा गया जो यह सब करवा सकते थे। फिर यह रीति बन गया।
मैं यह बात कहने का जोखिम ले रहा हूँ कि ब्राह्मण का कर्तव्य वास्तव में यह सब करना नहीं है। उसका कर्म है तपस्या, शक्ति की उपासना-साधना, वेदों का अध्ययन उसके नये-नये अर्थों की निष्पत्ति करना था। और ध्यान रखना यदि ब्राह्मण अपने मूल धर्म से विरत होगा तो उसका अधःपतन निश्चित है, निश्चित है, निश्चित है। उसे कोई बचा नहीं सकता।
जो ब्राह्मण अपना कल्याण चाहते हैं वे सारी नौटंकी, कक्थकड़ी छोड़ शक्ति की शरण में आयें। अपने कुलाचार का पालन करें। कुलदेवी की आराधना उपासना करें। सर्वप्रथम तो संध्यावंदन करें हीं। गायत्री का जप करें। उसका पुरश्चरण करें। दुर्गासप्तशती का पारायण करें। नवार्ण दीक्षा लेकर उसका पुरश्चरण करें। विभिन्न तंत्र ग्रंथों का अध्यवसाय करें। योग्य तंत्राचार्यों का शरण ग्रहण कर कुछ सिद्धियां-शक्तियां प्राप्त करें। आयुर्वेद, ज्योतिष आदि का गहन अध्ययन करें। और इनमें से कुछ भी न हो सके तो दुर्गा चालीसा/दुर्गा/बंगलामुखी/काली/पीतांबरा आदि नामों का ही 21, 51,, सवा लाख, 5 लाख, 11 लाख का जप करें पुरश्चरण करें। फिर देंखे अपने जीवन में घट रहे अप्रत्याशित, चमत्कारिक परिणाम को।
Friday, 27 June 2025
ब्राह्मणों ने जाति का निर्माण कैसे किया?
ब्राह्मणों ने जाति का निर्माण कैसे किया?
हमने कुछ लोगों को पकड़ा 10, 20, 50, 100, 1000 आदि गायें दिया, बना दिया यादव। काहे कि हम दूध, घी बहुत पीते-खाते थे? हमने कुछ लोगों को बंधक बनाया और भैंसे दिया बना दिया महिषवाल। हमने फिर कुछ लोगों को पकड़ा, भेड़ दिया, बना दिया गड़रिया। क्योंकि हम लोग ऊन के कपड़े बहुत ज्यादा पहनते थे फिर भी अधनंगे रहते थे? कुछ को बकरी दिया बना दिया बकरवाल, गुज्जर। क्योंकि हम बकरी का मांस भी खाते थे? हमने फिर कुछ मजलूमों को जबरन पकड़ा और चमड़ा दिया, बना दिया चमार। क्योंकि हम लोग चमड़े का जूता सिर से पैर तक खूब पहनते थे? कुछ को पहले से बने जूतों की मरम्मत का काम जबरन सौंपा वे बने मोची। क्योंकि ज्यादा चलने के कारण हमारे जूते टूटते बहुत थे?
कुछ लोगों को फिर दबोच लिया उन्हें सुअर दिया, बना दिया डोम/भंगी। क्योंकि सुअर का मांस भी हमें खाना पसंद था? इनसे हमने शवों को जलाने तथा विष्ठा साफ करवाने का घृणित कार्य भी करवाया क्योंकि हमारे यहाँ पहले से ही शौचालय बना होता था। हम लोग बाहर लैट्रिन करने नहीं जाते थे और विष्ठा भी बहुत ज्यादा करते थे न?
कुछ लोगों को ताड़ी के पेड़ पर चढ़ा कर ताड़ी लाने और बेचने का काम सौंपा वे बन गये पासी। भाई हम रात दिन ताड़ी पीकर टुन रहते थे, तभी हमें मानवता नहीं दिखती थी और दलितों को लूटने का काम आसानी से हो जाता था। कुछ लोगों को नाव दिया, बना दिया केवट व मल्लाह क्योंकि हम नदी मार्ग से बहुत आते-जाते थे। दिन में दस बीस चक्कर तो ही जाता था? कुछ लोगों को जाल पकड़ाकर नदी या ताल में धकेल दिया वे बन गये निषाद, मछुआरा क्योंकि हमें मछली खाना बहुत भाता था? बिना मछली के हमारा आहार सूना रहता था? कुछ लोगों को जमीन दिया, हल बैल दिया, बीज दिया बना दिया मौर्य। कुछ को कहा कि तुम केवल इन मौर्यों के यहाँ उगी सब्जी का व्यापार करोगे, वे बन गये कुजड़ा। हम कभी-कभी सब्जी भी खा लिया करते थे? कुछ बेहद मासूम लोगों को जमीन देकर कहा कि तुम केवल अनाज उगाओ, वे कुर्मी बन गये। कुछ को धागा बनाने की मशीन दिया बना दिया जुलाहा, कुछ को रुई धुनने का काम दिया बना दिया धुनिया। महाराज हमें भिन्न-भिन्न प्रकार के कपड़े पहनने का बेहद शौक था?
कुछ को लकड़ी बसुली, रुखान, दिया बना दिया बढ़ई। क्योंकि हम दिन भर लकड़ी के सामानों में ही घुसे पड़े रहते थे। कुछ लोहा और निहाई देकर विश्वकर्मा बना दिया। लोहे के हथियार भी हमारे बहुत काम आते थे। मजलूमों दलितों का वध करने में बड़ा उपयोगी होता था लोहे का हथियार। कुछ को उस्तरा और नहन्नी देकर नाई बना दिया। काहे कि हमारे दाढ़ी, बाल बहुत जल्दी-जल्दी उग आते थे। दिन में चार-छः बार बाल बनवाना पड़ता था?
कुछ से कहा कि तुम लोग फूल तोड़ो माला बनाओ और माली बनो। हम फूलों की माला पहनने के भी बड़े शौकीन थे? कुछ बांस और मूंज का ढकिया, मौनी बनाने का काम दिया वे बने धरिकार। कुछ को रस्सी में बांधा और उन्हें लोटा, गगरा व उबहन (पानी निकालने की रस्सी) दे, पानी भरने का काम सौंपा वे बेचारे दलित बने महार। कुछ को पालकी ढोने का काम दिया वे बने कहार। अब पैदल कौन आये जाये जब मानवयान की सवारी मिल जाती है? कुछ को चाक और मिट्टी देकर कुम्हार बना दिया। क्योंकि हमें रोज मिट्टी के बर्तनों की आवश्यकता पड़ती थी?
कुछ लोगों से हमने कहा कि तुम लड्डू व मिठाई बनाओ वे बेचारे बन गये मोदनवाल। भई हमें मिठाई खाना बेहद पसंद था? कुछ को कपड़ा बेचने का धंधा दिया वे बन गये बजाज, कुछ को चूड़ियां बेचने का काम सौंपा वे बने चूड़ीवाल।
कुछ हमारे बड़े अजीज थे उन्हें हमने सोना-चांदी का काम सौंपा दिया वे बने सोनार। कुछ लोगों को फरसा, भाला, तलवार, धनुष-बाण सौंपा और कहा कि तुम क्षत्रिय बन गये। जाओ सबको मारो काटो।
और खुद अधनंगा बदन लेकर सिर पर शिखा, माथे पर चंदन, कांधे पर जनेऊ और बगल में पोथी दबा लगे भागवत बांचने, कथा सुनाने, ज्ञान बघारने, मासूम निरीह, लोगों को लूटने, मूर्ख बनाने।
और इतिहास में हमने एकबार यह व्यवस्था बैठा दिया तो फिर बैठा दिया, हजारों साल तक कोई चूं नहीं बोला। सिर नहीं उठाया। बस दुम दबाकर फाओअप करते रहे। ऐसा फाओअप कर रहे हैं कि अब भी नहीं छोड़ पा रहे हैं। है कि नहीं।
देख रहा विनोद कैइसा गोल-गोल घुमा रहा है ई लोग।
या तो आप हमें मूर्ख समझ रहे या फिर खुद हैं और हमें मूर्ख बनाने की कोशिश कर रहे हैं। या फिर यह बहुत बड़ा खेल है, जिसके हाथ की हम आप सब कठपुतली बन रहे हैं और वह मजे लेकर खेल रहा है।
@ डॉ.विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी
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