Monday, 22 March 2021

अंतः अस्ति प्रारम्भः

 तुम न तो पूरा जीते हो और न ही पूरा मरते हो। तुम आधे अधूरे ढंग से जीते हो, मरते भी आधा अधूरा ही हो। जीवन पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं है लेकिन मरने पर है। अंतः अस्ति प्रारम्भः। अंत ही आरम्भ है। अगर तुम सोते समय होश से सोओगे तो नींद ध्यान बन जायेगी और फिर तुम्हारा पूरा दिन ध्यानमय रहेगा। तुम मस्त रहोगे। इसी तरह अगर मरते समय होश से भर जाओ तो जीवन लेते समय तुम होश में ही रहोगे। फिर तुम्हारा पूरा जीवन परमात्मा के आनन्द में बीतेगा। तुम्हें उसे ढूंढने के लिए कंकड़ पत्थर के मकानों में नहीं जाना पड़ेगा। तुम स्वयं परमात्मा ही हो जाओगे। बल्कि हो ही। बस अंजान अपने परमात्मापन से। @विनय नमन 🙏🧘‍♂️

Tuesday, 9 March 2021

असली त्याग



अगर तुम निर्धन हो और फिर तुम्हारे मन में धन के प्रति वितृष्णा का भाव जगे, अगर तुम शक्तिहीन हो और तब तुम्हारे मन में अहिंसा का भाव जगे, अगर तुम असफल हो और तब तुम्हारा पद-प्रतिष्ठा से मोह भंग हो, अगर तुम घर-परिवार-पत्नी-संतान से हीन हो और तब तुम्हारे मन में संसार की निस्सारता का भाव जगे, अगर तुम बेईमानी करने में असमर्थ हो फिर तुम ईमानदारी प्रदर्शित करो तब समझ लेना तुम बहुत बड़े, मक्कार, झूठे और फरेबी हो। सब कुछ पाने के बाद अगर तुम्हारे भीतर कुछ पाने की चाह न बचे, सब कुछ कर चुकने के बाद तुम ऊब जाओ, सब कुछ भोग लेने के बाद उस सबकी निस्सारता का भाव जगे तो ही समझना की तुम सच्चे वैरागी हुए। अन्यथा घर छोड़ने के बाद आश्रम बना लोगे, परिवार छोड़ने के बाद चेला-चपाटी बना लोगे, धन छोड़ने के बाद आश्रमों का साम्राज्य खड़ा कर लोगे, पद-प्रतिष्ठा छोड़ने के बाद लोगों से पैर छुआकर, पदवंदना करवा लोगे, वैराग्य धारण करने के बाद भी, प्रथम द्रष्टया सब कुछ छोड़ने के बाद भी कुछ नहीं छूटेगा। न तो कुछ छोड़ो न ही कुछ पकड़ो। बस द्रष्टा बनो, साक्षी बनो।

©विनय नमन🙏🧘‍♂️🧘‍♂️🧘‍♂️

महिला सशक्तिकरण

आज मैंने महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक छोटा सा कदम रखा। इस कदम का परिणाम क्या होगा यह अभी भविष्य के गर्भ में है किंतु एक बात का अहसास जरूर हुआ कि अधिकांश महिलाओं में "अकेलेपन का डर", अपने ऊपर "अविश्वास", पुरुषों द्वारा थोपी गयी बाध्यताओं का सामना करने में "हिचक", अनिर्णय की स्थिति, भविष्य के आंकलन में अक्षमता आदि कुछ जन्मजात और ज्यादातर परिवार, समाज आदि द्वारा कूट -कूट कर भरा गया है। अपने भीतर एक विराट संभावना और क्षमता समेटे होने के बावजूद एक महिला अपने आपको जब असहाय और दीन समझती है तब मैं इसे सिर्फ उसकी नाकामी के रूप में नहीं देखता बल्कि आज भी "लगभग जड़ समाज" की नाकामी के रूप देखता हूँ। हे नारी! तुम बस अपने ऊपर लिपटे खोल को एक बार तोड़ भर दो, असीम संभावना को समेटे समस्त आकाश तुम्हारा है।

©विनय नमन🙏🙏

Thursday, 4 March 2021

जिंदगी और सुकून की तलाश

*जिंदगी और सुकून की तलाश*

जो जिंदगी नहीं है जब तक उसे जिंदगी समझा जायेगा तक सुकून की तलाश बेईमानी है। जो जैसा है उसे वैसा स्वीकार कर लेने में ही सुकून है।
यद्यपि यह जीवन ही बेईमानी है। कितना भी कर लो, कुछ भी बन जाओ, कुछ भी पा जाओ, कुछ भी खा पी घूम लो मौज मस्ती कर लो लेकिन हाथ कुछ नहीं आने वाला है। जब तक हम बाहर सुकून की तलाश करेंगे तब तक सुकून आयेगा और चला जायेगा। क्षणिक होगा वह।

कभी आपने गौर किया है कि जब भी कुछ हम पाते हैं, खाते हैं, बनते हैं तब हमें एक सुख की अनुभूति होती है। जैसे - हमने एक नयी कार ले ली। बहुत सुख मिल रहा है। सीना चौड़ा करके चल रहे हैं। पड़ोसियों और दोस्तों को दिखा रहे हैं। लोगों की नजरों को भांप रहे हैं। इससे आपके अभिमान की तुष्टि हो जाती है। आप प्रसन्न हो जाते हैं। धीरे-धीरे लोगों की रुझान आपकी उपलब्धि में कम होने लगती है। लोग तारीफ करना बंद कर देते हैं। फिर धीरे-धीरे आपकी खुशी जाने लगती है। आप किसी अन्य चीज में खुशी तलाशने में जुट जाते हैं।

दरअसल आपको लगता है कि खुशी वस्तुओं, व्यक्तियों, पदों आदि में है लेकिन नहीं, वह आपके भीतर है, जिससे आप अंजान हैं। जब कोई इच्छित वस्तु, पद, प्रतिष्ठा, प्रेम, धन आदि मिल जाता है तब वह आपके भीतर से बाहर आ जाता है बिल्कुल एक बच्चे की तरह। लेकिन बच्चे की खुशी और आपकी खुशी में अंतर है। बच्चे की खुशी जिज्ञासा भाव के कारण है। वह तुच्छ कंकड़ से भी उतना ही खुश हो जाता जितना कि आप हीरे के कंकड़ को पाकर भी नहीं होते। लेकिन आपकी खुशी अभिमान जनित है। कल्पना कीजिये कि आपने करोड़ों रूपये वाली हीरे की अंगूठी पहनी और किसी ने उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया। आप दुखी हो जायेगें। वह हीरे की अंगूठी आपको सुख नहीं दे पायेगी। आपका अहंकार संतुष्ट नहीं हुआ।

कुल जमा मतलब यह है कि अहंकार जनित लालसा, अभिलाषा, तृष्णा ही आपके दुख का कारण है। अहंकार इसलिये कि आप मूलतः कुछ भी नहीं है लेकिन आप कुछ होना चाहते हैं। आप हैं तो सिर्फ वीर्य की एक बूंद की उपज यानी शून्य। लेकिन कुछ होने की छटपटाहट ही अशांति का कारण है। शांति चाहिए तो "कुछ होना" नहीं है, "बस होना है" just being. 

सुकून तलाशना है तो धारा के विपरीत मत बहो धारा के साथ बहो और छोड़ खुद को धारा के साथ। संभव है इस स्थिति में हम कहीं पहुंचे नहीं। हम वैसे भी कहीं पहुंचते नहीं। लेकिन इससे व्यर्थ तैरने का श्रम न करना पड़ेगा। जीवन भी ऐसा ही है। नियति के हाथों बहो। नियति के साथ बहो। तैरो मत। जीवन जीने का मजा और सुकून दोनों मिल जायेगा। दरअसल ये दोनों सहोदर ही हैं। यही जीवन में शांति का एक मार्ग है।

विनय नमन🙏😊

Wednesday, 23 December 2020

स्वप्रेम - 1

स्वप्रेम-1

स्वप्रेम क्या है?

पहले स्व का अर्थ -

स्व का अर्थ है "आप" यानि चैतन्य जो आपके भीतर मौजूद है। चैतन्य यानि परमात्मा का अंश। यह एक तरह से बूंद और सागर सा संबंध है। तुलसीदास ने इसे ही कहा है - "ईश्वर अंस जीव अविनासी।" किंतु आप सिर्फ आत्मा नहीं हैं। आत्मा का एक आवरण है आपका शरीर। यद्यपि आप शरीर ही नहीं हैं। शरीर एक आवरण मात्र है किंतु है महत्त्वपूर्ण। इसी शरीर के माध्यम से ही आप अपने आत्मतत्व को जान पायेंगे। अर्थात प्रथम दृष्ट्या आप शरीर और आत्मा दो तल पर हैं।

मनुष्य अपने जन्म के समय शरीर के तल पर शून्य होता है वह आत्मा के तल पर जीता है। जैसे-जैसे उसका विकास होता जाता है, सामाजीकरण की प्रकिया के तहत वह आत्मा के तल से दूर हटता जाता है और शरीर के तल पर प्रविष्ट होता जाता है। एक समय के बाद वह आत्मा को भूल ही जाता है सिर्फ वह देह रह जाता है। इस प्रक्रिया में ज्यों-ज्यों वह आत्मा के तल से दूर हटता जाता है उसके अंदर विकारों के विकृति की आवृत्ति बढ़ती जाती है। ये विकार जैसे - काम, क्रोध, मोह, लोभ, मद आदि मूलतः न तो बुरे हैं और न ही अच्छे। ईश्वर द्वारा निर्मित कोई भी तत्व अच्छा बुरा नहीं है, उसे अच्छा या बुरा बनाती है हमारी दृष्टि और हमारे संस्कार। ये ऊर्जा के स्रोत हैं।

जब हम आत्मा के तल पर जीते हैं तब यही काम की ऊर्जा परमात्मा के लिए, क्रोध की ऊर्जा करुणा में, मोह ऊर्जा प्रेम में, लोभ ऊर्जा दान में, मद की ऊर्जा दया में परिणत हो जाती है। वहीं जब हम शरीर के तल पर जीते तब काम के ऊर्जा अतिशय संभोग में, क्रोध ऊर्जा विनाश में, मोह ऊर्जा बंधन में, लोभ ऊर्जा भ्रष्टाचार में, मद की ऊर्जा परपीडन में बदल जाती है।

जब मनुष्य एकदम देह के तल पर पहुंचता है तब वह समस्त विकारों से ग्रस्त एक दानव के रूप में बदल जाता है। ऐसा दानव जो पूरी मनुष्यता के लिये खतरा है। ऐसा सहस्राब्दियों में कभी कभार घटता है। जैसे रावण, हिटलर, मुसलोलिनी आदि। सामान्य मनुष्य इन दोनों के मध्य जूझता रहता है। आधा मानव आधा दानव। यदि हमें स्व से प्रेम करना है तब सबसे पहले हमें अपने मूल रूप को पहचानना होगा। हमारे व्यक्तित्व का झुकाव किधर है।

(क्रमशः)

@विनय नमन

संसार क्या है?


यह संसार हमारी ही निर्मिति है। हमारे विचार, हमारी इच्छाएं, हमारी वासनाएं इसे निर्मित करती हैं। आपको क्या लगता है कि कोई स्त्री या पुरुष सुंदर है? नहीं हमारी वासना उसे सुंदर या असुंदर बनाती है। एक ही वस्तु किसी को अच्छी या बुरी लगती है। क्या वह वस्तु अच्छी या बुरी है? नहीं हमारी धारणा उसे वह गुण प्रदान करती है। अर्थात जो वस्तु जैसी है हम उसे वैसा नहीं देख पाते। हमारे इंद्रिय रूपी प्रोजेक्टर संसार रूप परदे पर फिल्म भरते हैं और यह प्रोजेक्टर वह फिल्म दिखाता है जैसा हमारे विचार, संस्कार हैं। अगर हमारे सामने कोई बुरा या अच्छा दृश्य दिखता है या हमें कोई चीज़ बुरी या अच्छी लगती है तो इसका अर्थ है कि उस वस्तु में उक्त गुण हम प्रविष्ट करा रहे हैं। वह वस्तु तो जैसी है बस वैसी है।

एक पत्थर में किसी ईसाई मूर्तिकार को जीसस दिखेगा तो हिंदू को राम या कृष्ण, बौद्ध को बुद्ध तो जैन को महावीर। मुस्लमान को उसमें कुछ न दिखेगा। वह उससे मस्जिद बनाने की सोचेगा। अगर कोई बहेलिया उस पत्थर को देखेगा तो उसे चिड़िया मारने वाले कंकड़ में बदल लेगा लेकिन सड़क बनाने वाले को वही पत्थर सड़क निर्माण की कच्ची सामग्री प्रतीत होगा। मकान बनाने वाला उसी से मकान बनायेगा। आपको क्या लगता है वह पत्थर इनमें से क्या है? सच तो यह है कि पत्थर सिर्फ पत्थर है। उसे नाना प्रकार का आकार और कार्य सिर्फ हम देते हैं। यह संसार हमारी ही कल्पना, वासना, विचार और इच्छा का विस्तार है।

@विनय नमन🙏

पीढियों का अंतर्द्वंद

हमारे माता-पिता अपने माता-पिता के सपनों, अरमानों को जी रहे थे, हम अपने माता-पिता के और हमारे बच्चे हमारे सपनों और अरमानों को ढोयेंगे। लोग अपने ही सपनों को नहीं जी पाते फिर दूसरों के सपनों की कौन कहे। यह समस्या हजारों सालों से पीढ़ी दर पीढ़ी हम ढोते चले आ रहे हैं। हमारे माता-पिता के माता-पिता अपने समय के सपने 20-30 साल बाद अपने बच्चों से पूरा करवाने की जिद पाले थे। यही अपेक्षा हमारे माता-पिता हमसे करते हैं और यही हम अपने बच्चों से करेंगे। हम अपने पुराने सपने नये दौर में देखने की जिद करते हैं जो कि अप्रासंगिक हैं।

आज से 50 साल पहले का समय और उसकी मांग आज के समय से भिन्न थी। आज के 50 साल बाद समय और उसकी मांग भिन्न होगा ही। हम क्यों अपने बच्चों को 50 साल पुराने सपने देखने पर मजबूर करते हैं। हर आदमी के अपने सपने होते हैं, उन्हें खुद पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए। अगर न हो पाये तो नियति मानकर भूल जाना चाहिए किंतु नयी फसल को पुराने मौसम के नाम पर कुर्बान नहीं करना चाहिए। जब हम दूसरे से अपने सपने पूरा करने का सपना संजोते हैं तो अक्सर इसकी परिणति विषाद पूर्ण ही होती है। इसी कारण हर माता-पिता अपने बच्चों से दुखी होते हैं। इसीलिये दोनों के बीच वैमनस्य, कलह और अन्तर्द्वन्द चलता रहता है। इस समस्या से मुक्ति का एकमात्र उपाय है, खुद को दूसरे के अरमानों और सपनों से मुक्त करो और अपनी संतानों को उनके अपने सपने और अरमान जीने दो। मत थोपो उनपर अपने जीर्ण सपने। 
©विन्ध्येश्वरी