Sunday, 24 May 2020

बूंद और समुद्र


कबीरदास जी कहते हैं-
"हेरत हेरत हे सखी, रह्या कबीर हेराय।
बूंद समानी समद में सो कत हेरी जाय॥"

मनुष्य और ईश्वर के मध्य बूंद और समुद्र सा संबंध है। समुद्र वस्तुतः कुछ नहीं है अनन्त बूंदों का संग्रह है और बूंद भी कुछ नहीं है उसी समुद्र का एक हिस्सा है। परमात्मा भी कुछ नहीं है। हम सब मनुष्य ही एक परमशक्ति का निर्माण करते हैं और हम भी कुछ नहीं हैं सिवाय एक बूंद के। जब हम परमात्मा को ढूंढते ढूंढते स्वयं के अस्तित्व को भूल जाते हैं तब हम परमात्मा हो जाते हैं। यानि अपने 'मैं पन' को मिटाना ही ईश्वर को पाना है। "मैं पन का तात्पर्य है मैं कुछ हूँ।" किसी शायर ने कहा है - "मिटा दे अपनी हस्ती को अगर तू मर्तबा चाहे। दाना खाक में मिलकर गुले गुलज़ार होता है।" बीज को वृक्ष बनने के लिये स्वयं को मिटाना होगा। किंतु यह हमारा भ्रम है कि बीज मिट गया है। बीज मिटा नहीं है वह वृक्ष में परिवर्तित हो गया है। हम भी अपने अस्तित्व को मिटाकर मिटते नहीं बल्कि बीज की तरह वृक्ष में परिवर्तित हो जाते हैं या बूंद की तरह समुद्र हो जाते हैं। दुर्भाग्य यह है कि हम न तो वृक्ष होना चाहते हैं और न ही समुद्र होना चाहते हैं।

हमने अपनी सुविधानुसार अपने अपने परमात्मा गढ़ लिये हैं। किंतु इससे होना जाना कुछ नहीं है। हम जिस प्रकार अपने गम को भरने के लिए शराब का सहारा लेते हैं, ठीक उसी प्रकार हमने अपने खालीपन को भरने के लिये विभिन्न भगवानों, धर्मों और धर्मग्रंथों का निर्माण कर लिया है। यह हमारे नशे को तृप्त करने का एक साधन मात्र है। ध्यान रहे यह नशा हमें ईश्वरत्व का बोध नहीं करायेगा बल्कि शराब की तरह हमारा नाश कर देगा। पता बताइये उस पंडे, पुजारी, पुरोहित, मुल्ला, मौलवी, पादरी का जिसने इस मार्ग पर चलकर ईश्वर को आत्मसात कर लिया हो। ये लोग हमारे भय का व्यापर करते हैं। हमें स्वर्ग और नर्क का भय दिखाते हैं। भय ही नर्क है और अभय ही स्वर्ग है। इन्होंने अजीबोगरीब स्वर्ग और नर्क गढ़ा है। यहाँ स्त्री का त्याग करो स्वर्ग में अप्सराएँ- हूरें मिलेगीं वह भी एकदम 16 वर्षीय कभी न वृद्ध होने वाली। ध्यान रहे इन्होंने स्त्रियों के लिये देव पुरुष या फरिश्ते नहीं गढ़ा। क्यों? यह पता नहीं या शायद इस धरती की तरह वहाँ भी केवल पुरुष प्रधान समाज होता हो। यहाँ अपनी आकांक्षाओं का त्याग करो वहां कल्प वृक्ष मिलेगा सारी मनोकामनाएं पूरी करने वाला। नर्क भी अपनी सुविधानुसार गढ़ा तिब्बत के आदमियों के लिये नर्क में कंपकंपाती ठंड की व्यवस्था है जबकि भारत और अरब देश के आदमी के लिये नर्क में भयानक गर्मी का प्रबंध है। नर्क के अधिकारी ने ऐसा क्यों किया पता नहीं।

इन्हीं सब कपोल-कल्पनाओं के सहारे हमारे, आप सबके भय का व्यापार किया जाता है जबकि परमात्मा इन सबसे परे है। वह हानि-लाभ, जय-पराजय, मान-अपमान, पुण्य-पाप, हिंसा-अहिंसा, काम-क्रोध, लोभ-मोह, मद-मत्सर आदि से परे चिरंतन है। "अपने होने का भ्रम" मिटाइये और परमात्मा बन जाइये।

©विन्ध्येश्वरी

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