Friday, 22 May 2020

स्त्री और पुरुष के कर्म

मुझे यह मानने में कतई संकोच नहीं है कि "स्त्री और पुरुष समान नहीं हैं।" दोनों के मध्य शारीरिक, मानसिक और जैविक जैसे कई स्तरों पर अंतर विद्यमान है। स्वभावतः स्त्री सृजन, ममता, वात्सल्य, करुणा, धैर्य आदि गुणों से युक्त है। साथ ही वह जैविक रूप से सभी 23 xx गुणसूत्रों से युक्त "पूर्ण" मनुष्य है। दूसरी तरफ पुरुष सृजन सहायक, कठोर, अश्रु पीने वाला, अधैर्यशील प्राणी है। गुणसूत्रों की अपूर्णता (23 गुणसूत्र किंतु 23वां गुणसूत्र xy) के कारण उसे सदैव कुछ कमी खटकती रहती है जो उसे चलायमान बनाती है। इसका सीधा सा अर्थ है कि स्त्री पुरुष के लिए समान कार्य नहीं हो सकते।

यदि किसी स्त्री को युद्ध में शत्रु से लड़ने भेज दिया जाये और वह शत्रु पर प्रहार करने के बजाय ममता प्रदर्शित करने लगे तब तो हो गया "बंटाधार"। या शल्य-चिकित्सा करते समय उसकी करुणा जग जाये तो शल्य-क्रिया मुश्किल हो जायेगी। वहीं जब एक पुरुष को किसी शिशुगृह का संरक्षक या परिचारक बना दिया जाये और किसी शिशु के रोने पर उसके भीतर की कठोरता जग जाये फिर बच्चे का तो "कल्याण" हुआ समझो। यह ठीक वैसे ही है जैसे गेहूं से "भात" नहीं बनाया जा सकता है और चावल से रोटी। या आलू से पनीर नहीं बनाया जा सकता और पनीर से आलू। या ट्रेन को हवा में नहीं उड़ाया नहीं जा सकता या हवाई जहाज को ट्रेन की पटरी पर दौड़ाया नहीं जा सकता।

किंतु इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि "कथित रूप से पुरुषों के लिए आरक्षित कार्य" स्त्री नहीं कर सकती या "कथित रूप से स्त्रियों के लिये आरक्षित कार्य पुरुष नहीं कर सकता।" जिस कार्य के लिए जो अनिवार्य योग्यता, कौशल और गुण आवश्यक हैं यदि वह उनमें से किसी में भी है तो वह उस कार्य को करने के लिए स्वतंत्र है। और ऐसे अनेक उदाहरण समाज में उपलब्ध भी हैं जब स्त्री और पुरुष ने प्रचलित रुढ़िबंधों का तोड़कर अपनी प्रकृति के विपरीत कार्य किया और उसमें सफलता ही नहीं प्राप्त किया बल्कि प्रतिमान स्थापित किया। यह भी ठीक वैसे ही जैसे चावल के आटे से रोटी बनती है या गेंहू को उबाल कर खाया जा सकता है। पनीर में कम मसाला डालकर आलू की तरह खाया जा सकता है या आलू वाली सब्जी को ज्यादा छौंक लगाकर ज्यादा मसाला डालकर पनीर की तरह खाया जा सकता है। ट्रेन को बुलेट ट्रेन में बदला गया है और संभव है क्वांटम फिजिक्स में प्रगति के बाद ट्रेन उड़ने लगे और वायुयान ट्रेन की पटरियों के मुताबिक ढालकर दौड़ाया जा सके। ऐसा होने से समाज में कार्य की विविधता, प्रकृति, करने के तरीके आदि में गुणात्मक परिवर्तन आयेगा, स्वाद में वृद्धि होगी, लोगों को और अधिक विकल्प उपलब्ध होगें।

मुश्किल यह है कि "यह कौन निर्धारित करे कि कौन क्या कर सकता है?" इसका सिर्फ एक उत्तर है - "जो वैसा करना चाह रहा है।" यदि एक महिला किसी को भी बेहरमी से उठाकर पटक सकती है, पीट सकती है या गोलियों से भून सकती है तो उसे निस्संदेह पहलवान, मुक्केबाज, सैनिक या फिर गैंगस्टर बनना चाहिये। या एक पुरुष अगर ममता और करुणा से भरा हुआ है तो बेशक उसे शिशुगृह का उत्तरदायित्व दिया जाना चाहिए या फिर नर्स के रूप काम करना चाहिए।

यद्यपि ऊपरी तौर पर यह दर्शन काफी रुचिकर प्रतीत होता है किंतु इसमें एक मुश्किल यह है कि "यह संभवतः व्यापक पैमाने पर लागू नहीं हो सकता है।" क्योंकि जिस चीज का जो स्वभाव है वह एक तो आसानी से छोड़ नहीं सकता और न ही आसानी से बदला जा सकता है। एक सीमा के बाद यह बदलाव अरुचिकर भी प्रतीत होने लगता है। जैसे आलू की सब्जी को कब तक पनीर की तरह खाया जा सकता है साथ ही क्या मात्र पनीर मसाला मिला देने से आलू पनीर हो जायेगा? वायुयान कब तक ट्रेन की पटरी पर दौड़ सकता है साथ ही ट्रेन की पटरी पर दौड़ने से क्या वायुयान वायुयान रह जायेगा? चावल के आटे की रोटी हम कब तक खा सकते हैं? क्या गेंहूं के सारे पोषक तत्व चावल में मिल सकते हैं? या गेंहूं को कब तक उबाल कर खाया जा सकता है?

इसका एक अर्थ यह है कि यद्यपि दोनों अपनी प्रकृति के विपरीत कार्य करने के लिए स्वतंत्र हैं, होने ही चाहिये और यह निर्णय करने का हक पंगु और जड़ समाज को नहीं बल्कि उसे स्वयं मिलना चाहिए। लेकिन प्रकृति के अनुरूप कार्य करने से प्रगति की गति बढ़ जाती है ठीक वैसे ही जैसे धारा के विपरीत किसी की भी चाल कम हो जाती है जबकि धारा के अनुकूल प्रवाहित होने पर गति में वृद्धि हो जाती है।

©विन्ध्येश्वरी

6 comments:

  1. बहुत सुंदर लेख

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    1. धन्यवाद आपका। कुछ सुझाव या सलाह देना चाहेंगे आप?

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  2. लिंगनिर्धारण से किसी मानव के कर्म का निर्धारण नही होता , बल्कि उसकी योग्यता से उसके कर्मो का निर्धारण होता है

    अगर सही मायने मे प्रकृति के साथ न्याय किया जाये तो.....

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  3. बेहतरीन लेख

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