धर्म जड़ नहीं है, गतिमान है। मैं ऐसा इसलिये कह रहा हूँ क्योंकि धर्म जीवन जीने का एक मार्ग है। चूंकि जीवन गतिमान है अतः धर्म भी गतिमान है। अर्थात समय के साथ धर्म की रीति-नीति, नियम-परम्परा में परिवर्तन होना ही चाहिए अन्यथा वह जीवन को जड़ बना देगा। जो सृष्टि के विनाश का एकमात्र कारण होगा। आजकल यही हो रहा है। हर तरफ कथित धार्मिक जड़ता का साम्राज्य है। कथित इसलिये कि वह धर्म नहीं है, धर्म का आवरण है। असली धर्म तो दिखता ही नहीं हमें। क्या धार्मिक परंपराओं के नाम पर हम जीवन को नष्ट होने दें? दीपावली पर पटाखा नहीं छूटा तो धर्म टूटा, नदी में दुर्गा, गणेश, लक्ष्मी का विसर्जन नहीं हुआ तो धर्म टूटा, होली पर चेहरे पर मोबीआॅयल, कचरा और सिंथेटिक रंग पोतने पर पाबंदी लगी तो परंपरा का हनन हो गया, बकरीद पर बकरा नहीं कटा तो अल्लाह नाराज हो गया, तीन तलाक, हलाला, मुताह निकाह पर टिप्पणी हुई तो कयामत हो गया, किसी कथित निम्न वर्णीय व्यक्ति के हाथ का छुआ खाया तो धर्म भ्रष्ट हो गया। आखिर धर्म इतना क्षणभंगुर कैसे हो गया? वह तो नदी की तरह सतत गतिमान, नवोंमेषी और सागर की तरह विशाल और प्रशांत है। हम क्यों नहीं सोचते कि हम कथित धर्म के कारण जीवित नहीं हैं बल्कि धर्म हमसे है। अर्थात जीवन महत्वपूर्ण है धर्म नहीं। फिर धर्म की शर्त पर हम जीवन क्यों होम करते हैं?
धर्म भय का स्रोत नहीं अभय का मार्ग है। धर्म जीवन का हंता नहीं जीवन को सुंदर बनाने का तरीका है। लेकिन अज्ञानता के कारण, हम कट्टर हो रहे हैं। हम वास्तविक धर्म त्याग कर धर्म के विंबों को ग्रहण कर रहे हैं। जिस भंगुर धर्म का हम कट्टरता से वरण करते हैं वह सिर्फ तीन तथ्यों पर आधारित हो सकता है। एक- पंडित-पुजारियों, मौलवियों, पादरियों द्वारा खुद के अस्तित्व को बनाये रखने का उपक्रम, दो- आतंकवाद का जरिया (इसे सिर्फ इस्लामिक आतंकवाद न समझें यह व्यापक शब्द है), तीन- सृष्टि का विनाश। क्या हम यही चाहते हैं?..........................
धर्म भय का स्रोत नहीं अभय का मार्ग है। धर्म जीवन का हंता नहीं जीवन को सुंदर बनाने का तरीका है। लेकिन अज्ञानता के कारण, हम कट्टर हो रहे हैं। हम वास्तविक धर्म त्याग कर धर्म के विंबों को ग्रहण कर रहे हैं। जिस भंगुर धर्म का हम कट्टरता से वरण करते हैं वह सिर्फ तीन तथ्यों पर आधारित हो सकता है। एक- पंडित-पुजारियों, मौलवियों, पादरियों द्वारा खुद के अस्तित्व को बनाये रखने का उपक्रम, दो- आतंकवाद का जरिया (इसे सिर्फ इस्लामिक आतंकवाद न समझें यह व्यापक शब्द है), तीन- सृष्टि का विनाश। क्या हम यही चाहते हैं?..........................
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