Sunday, 14 January 2018

प्रकाश ही विकास है

निबंध का विषय - प्रकाश ही विकास है

(आई. ए. एस. मुख्य परीक्षा के लिये प्रथम बार निबंध लिखने का प्रयास कर रहा हूँ। आप सब प्रिय मित्रों से निवेदन है कृपया निबंध पढ़कर सही मूल्यांकन करते हुए सार्थक सुझाव देने का कष्ट करें।)

सुरमयी संध्या के समय पक्षीगण कतारबद्ध होकर शांत भाव से अपने-अपने घोंसले में वापस आ रहे हैं। गायें धूलि उड़ाती हुई गोशालाओं में लौट रही हैं। लोग अपने-अपने काम को समाप्त कर घरों की ओर लौट रहे हैं। धीरे-धीरे पूरा वातावरण शांत और चारों ओर नीरवता ही नीरवता। वसुधा सो चुकी है। चल रहा है सिर्फ नियति नटी का कार्यकलाप। शांत और चुपचाप।
अरुणिम आभा के साथ सूर्य अपने उदयाचल पर विराजमान हो चुका है। कवि लिखते हैं -
"चाहता उछलूं विजय कह,
पर ठिठकता देखकर यह,
रात का राजा खड़ा है,
राह में बनकर भिखारी,
आ रही रवि की सवारी।"

अरे! रात का राजा भिखारी क्यों हो गया? रवि, प्रकाश का देवता विजयी क्यों हो गया? यही तो है "प्रकाश ही विकास  है"। सारी जगती जाग चुकी है। पक्षीगण कलरव करते हुए भोजन की खोज में निकल चुके हैं। अधिकारी-कर्मचारीगण, मजदूर वर्ग अपने-अपने कार्यस्थल की ओर चले आ रहे हैं। बच्चे उछलते- कूदते विद्यालय की ओर जा रहे हैं। लग रहा है सम्पूर्ण सृष्टि में जीवन का संचार हो गया है।

सचमुच प्रकाश ही विकास है। प्रकाश के साथ आर्थिक, बौद्धिक, ज्ञान, सामाजिक - सांस्कृतिक, राजनैतिक, प्राकृतिक, जैविक और भौतिक आदि सभी प्रकार के विकास जुड़े हुए हैं।

विश्व के अधिकांश आर्थिक क्रियाकलाप दिन में ही सम्पन्न होते हैं। लोग अपने कार्यस्थल पर दिन में ही कार्य करते हैं। विश्व सभ्यता के विकास की धुरी प्रकाश और ऊर्जा के विभिन्न स्रोत जैसे विद्युत, पेट्रोलियम, भू-तापीय ऊर्जा, जैव ईंधन आदि  होकर ही गुजरती है। दिलचस्प है कि आदिम सभ्यता की प्रथम खोज प्रकाश और ऊर्जा के रूप में आग ही है।

एक तरह से ज्ञान को भी प्रकाश कहा गया है। श्री गुरुगीता में आता है -
"गुकारश्चान्धकारो हि, रुकारस्तेज उच्यते।
अज्ञानग्रासकं ब्रह्म, गुरुरेव न संशयः।।"
अर्थात् गुरु शब्द का 'गु' अंधकार तथा 'रु' प्रकाश का प्रतीक है। ब्रह्म रूपी गुरु ही इस अज्ञान को समाप्त करने वाले हैं।

जब गुरु के ज्ञान का प्रकाश मिलता है तब शिष्य का अज्ञान रूपी अंधकार समाप्त हो जाता है तथा उसका सर्वांगीण, आध्यात्मिक, मानसिक, बौद्धिक तथा भौतिक विकास होता है और वह उत्तरोत्तर विकसित ही होता जाता है। क्योंकि कहा गया है -
"गुकारः प्रथमो वर्णो मायादिगुणभासकः।
रुकारोऽस्ति परं ब्रह्म मायाभ्रान्तिविमोचनम्।।"
अर्थात् 'गु' यह प्रथम वर्ण माया, मोह, मद, मत्सर आदि का प्रतीक है जबकि 'रु'  परब्रह्म रुपी है जो इन सबको हटाने वाला है।

गुरु, शिष्य की नचिकेताग्नि को उद्दीप्त कर तथा उसका सम्यक समाधान कर उसके सर्वांगीण विकास का मार्ग प्रशस्त करते हैं। इससे उसके निजी कल्याण के साथ ही समाज, देश और सम्पूर्ण मानवजाति का विकास होता है। गुरु से ज्ञान प्राप्त कर ही नानक जी ने आत्म कल्याण के साथ मानवमात्र को आलोकित किया। इसी स्मृति में प्रकाश-पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। बुद्ध, महावीर, मुहम्मद साहब, ईसा मसीह, कबीरदास, संत दादू, संत रविदास, मीराबाई आदि ने अपने ज्ञान के प्रकाश से संसार को आलोकित किया। जिससे लोग आज भी प्रकाश प्राप्त कर आत्म-विकास करते हैं।

प्रकाश-पर्व दीपावली भी इसी प्रकाश के साथ विकास का अद्भुत संयोजन है। धान की मड़ाई के बाद भारतीय किसान समाज धन-धान्य सम्पन्न होकर दीप जलाकर लक्ष्मी का स्वागत करता है। प्रकाश के साथ हर्षोल्लास और बंधुत्व का प्रसार होता है। व्यापारी बंधु इस पर्व की उत्सुकता पूर्वक प्रतीक्षा करते हैं और प्रचुर व्यापार कर विकास की ओर अग्रसर होते हैं।

राजनीति और राज्य भी "प्रकाश ही विकास" की संकल्पना से अछूता नहीं है। यद्यपि यहां इसका अर्थ बदल जाता है। यहां प्रकाश का अर्थ है - स्वतंत्रता, समानता, न्याय और लोक- कल्याणकारी राज्य की स्थापना। स्वाधीनता की पहली सुबह से पूर्व लाल किले की प्राचीर से अपने प्रथम और प्रसिद्ध उद्बोधन 'Trust with destiny' में पं. नेहरू जी ने कहा था-"आज रात बारह बजे, जब सारी दुनिया सो रही होगी, भारत जीवन और स्वतंत्रता की नयी सुबह के साथ उठेगा। एक ऐसा क्षण जो इतिहास में बहुत कम आता है, जब हम पुराने को छोड़ नये की तरफ जाते हैं, जब एक युग का अंत होता है और जब वर्षों से शोषित एक देश की आत्मा अपनी बात कह सकती है।"

पंडित नेहरू जी का उक्त उद्बोधन एक नयी सुबह के साथ भारतीय विकास की उड़ान को एक नयी उम्मीद, नया साहस देने के साथ देश के भविष्य का नया चित्र खींचता है।

अमेरिकी स्वतंत्रता क्रांति, फ्रांसीसी क्रांति, इंग्लैंड की रक्तहीन क्रांति, रूसी क्रांति आदि स्वतंत्रता रूपी प्रकाश की प्राप्ति की छटपटाहट से ही निकले हैं। जगजाहिर है कि आज ये देश विकास के शीर्ष पर विराजमान हैं। स्वतंत्रता की यह लौ न केवल राज्य के स्तर पर बल्कि आम आदमी, शोषित - पीड़ित, दलित और दमित वर्ग के लिये भी उतना ही आकर्षक और उपयोगी है। इन वर्गों ने भी स्वतंत्रता और समानता प्राप्त कर विकास की असीम ऊंचाइयों को छुआ है।

जीवों और वनस्पतियों का विकास भी प्रकाश के आलोक में सम्भव होता है। यद्यपि कई सारी जैविक क्रियाओं के लिये प्रकाश की आवश्यकता नहीं होती तथापि जीवन के प्रमुख स्रोत भोजन को जीव और खास करके वनस्पति और पेड़ - पौधे प्रकाश की उपस्थिति में प्राप्त करते हैं।

भौतिक - सांसरिक जगत में विद्युत ऊर्जा की खोज, बल्व का आविष्कार, सौर्य ऊर्जा दोहन आदि के माध्यम से मनुष्य विकास की असीम ऊंचाइयों को छू रहा है। बिना इसके विकास की कल्पना करना भी दुष्कर है। इसीलिये विभिन्न राज्य अपने नागरिकों को ऊर्जा और प्रकाश सस्ते, सहज और सरल तरीके से उपलब्ध कराने हेतु प्रयत्नशील रहते हैं। इस संदर्भ में भारत सरकार की कई पहलें जैसे, राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना, सौर्य ऊर्जा मिशन, स्वच्छ एवं नवीकरणीय ऊर्जा मिशन आदि उल्लेखनीय हैं।

यद्यपि विकास की आपाधापी में मनुष्य इतना मग्न हो गया कि प्रकाश का वास्तविक उद्देश्य भूल गया। प्रकाश का उद्देश्य विकास करना है न कि विनाश। किंतु प्रकाश और ऊर्जा के प्रमुख स्रोत, प्राकृतिक संसाधनों का मनुष्य ने अविवेकपूर्ण और अंधाधुंध दोहन किया। फलतः अनेक पर्यावरणीय, आर्थिक और जीवन अस्तित्व की समस्याएं उत्पन्न हो गयीं। विद्युत निर्माण इकाइयों से पर्यावरण प्रदूषण, शहरीकरण और अति प्रकाश के उपयोग से प्रकाश प्रदूषण आदि कुछ ऐसी ही समस्याएं हैं। आवश्यकता इस बात की है कि प्रकाश को विकास का संधृत और संतुलित माध्यम बनाया जाये न कि विनाश का अस्त्र और समस्या की जड़।

"न कर इतना उजाला तू, कि आंखें चकमका जायें।
मगर हो रौशनी इतनी, कि दुनिया जगमगा जाये।
ये माना रौशनी जग में, इबारत लिख रही प्रतिपल।
इमारत है बड़ी ऊंची, कहीं ना चरमरा जाये।"

No comments:

Post a Comment